झाबुआ में सोमवार को अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव के तहत जिला स्तरीय कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह आयोजन पीएम श्री कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में जिला प्रशासन और गीता प्रतिष्ठान के संयुक्त तत्वावधान में कलेक्टर नेहा मीना की अध्यक्षता में हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान श्रीकृष्ण, माँ सरस्वती और श्रीमद्भगवद्गीता की पूजा-अर्चना के साथ हुआ। कलेक्टर नेहा मीना ने इस अवसर पर कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन का व्यावहारिक मार्गदर्शन है। उन्होंने बताया कि गीता का ज्ञान हमें कर्तव्यपालन, आत्मअनुशासन और कर्मयोग की प्रेरणा देता है। मीना ने आगे कहा कि ऐसे महोत्सवों से विद्यार्थियों में आध्यात्मिक जागरूकता बढ़ती है। साथ ही, यह जीवन में धैर्य, एकाग्रता और सकारात्मक सोच विकसित करने का संदेश भी देता है। उन्होंने जोर दिया कि ऐसे आयोजन बच्चों में चरित्र निर्माण और संस्कारों के संवर्धन का आधार बनते हैं, जो उनके भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। कार्यक्रम के दौरान श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय का सस्वर पाठ गीता प्रतिष्ठान के प्रहलाद जोशी और प्राचार्य सीमा त्रिवेदी ने किया। इसमें छात्राओं और उपस्थित जनसमुदाय ने सक्रिय रूप से भाग लिया। सस्वर पाठ के बाद जैमिनी शुक्ला ने अध्याय का भावार्थ प्रस्तुत किया। इसके उपरांत, राजेश बालसोरा ने कर्मयोग, गीता के सार और सनातन संस्कृति में गीता के महत्व पर विस्तृत जानकारी दी। कार्यक्रम का समापन विधिवत गीता आरती के साथ हुआ। आरती के बाद कलेक्टर नेहा मीना ने छात्राओं के साथ गीता ज्ञान पर संवाद किया और उनके प्रश्नों के उत्तर दिए। कार्यक्रम के अंत में श्री प्रदीप पंड्या ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत जितेंद्र सिंह चौहान, अपर कलेक्टर सी. एस. सोलंकी, एसडीएम झाबुआ भास्कर गाचले, सहायक आयुक्त जनजातीय कार्य विभाग सुप्रिया बिसेन, जिला शिक्षा अधिकारी आर. एस. बामनिया सहित अन्य अधिकारी, विद्यालय स्टाफ और छात्राएं उपस्थित रहीं।
क्यों मनाई जाती है गीता जंयती मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान पूर्णावतार भगवान श्री कृष्ण ने युद्ध के मैदान में अर्जुन को गीता के अनमोल वचन सुनाए थे। यानि इसी दिन श्रीमद्भगवद गीता जन्म हुआ था। गीता जयंती का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ गीता के श्लोक आज 21वीं सदी में भी लोगों को जीवन की सही राह दिखाने का काम करते हैं। इसमें धर्म के साथ कर्म का मर्म समाहित है। सही मायने में कहा जाए तो यह कर्म, भक्ति और ज्ञान का संगम है, जिसमें डुबकी लगाने वाले व्यक्ति को जीवन में जरूर सफलता मिलती है। भगवान श्री कृष्ण के द्वारा कहे गए गीता के अनमोल वचन व्यक्ति को कठिन समय में जीवन की सही राह दिखाने का काम करते हैं। गीता में कहा गया है कि किस तरह कठिन से कठिन समय में भी कर्म करते हुए धर्म का दामन नहीं छोड़ना चाहिए। सही मायने में देखा जाए तो श्रीमद्भगवद गीता में जीवन की हम समस्या का समाधान मिलता है। गीता के प्रथम श्लोक का क्या है मर्म धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय. भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए उपदेशों से जुड़ी गीता के पहले श्लोक के पहले दो शब्द पर यदि गौर करें तो इसमें पूरी श्रीमद्भगवद गीता का सार समाहित है। ये दो शब्द हैं धर्मक्षेत्रे और कुरुक्षेत्रे। यह संदेश देता है कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म के क्षेत्र में धर्म का अनुसरण करें। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि धर्म ही मनुष्य का पिता, माता, भाई, मित्र, रक्षक और स्वामी है। इसलिए कर्म करते हुए किसी भी सूरत में धर्म का साथ न छोड़ें। गीता के जरिए श्रीकृष्ण ने दिया है ये संदेश
भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं – ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन:’, अर्थात व्यक्ति का सिर्फ कर्म करने पर अधिकार है फल पर नहीं. ऐसे में उसे कर्म को फल की इच्छा लिए हुए नहीं बल्कि कर्तव्य समझकर करना चाहिए. इसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण अपने भक्तों को गीता के जरिए संदेश देते हैं कि – ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:’ यानि पृथ्वी पर जब-जब धर्म की हानि और अधर्म बढ़ता है तो भगवान स्वयं पृथ्वी पर अवतार लेते हैं। श्री कृष्ण कहते हैं कि – ‘नैनं छिद्रन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:’ यानि आत्मा अजर-अमर है और उसे न तो कोई शस्त्र काट सकता है और न ही आज उसे जला सकती है. भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट रूप से गीता के वचन में कहा है कि – ‘परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्’ यानि वे सज्जन और अच्छे लोगों के कल्याण और दुर्जन लोगों के विनाश के लिए समय-समय पृथ्वी पर प्रकट होते हैं।


