नागौर जिला मुख्यालय से अजमेर रोड पर स्थित ईनाणा गांव में पुरानी परम्पराएं आज भी जीवित हैं। बुजुर्गों द्वारा शुरू की गई इस परम्परा को युवा बड़े चाव से निभाते हैं। यह परम्परा शादी के बाद निभाई जाती है, जिसे देखकर राहगीर भी हैरान हो जाते हैं। आपने सामान्यतः हिंदू शादियों में देखा होगा कि शादी के बाद दूल्हा-दुल्हन एक साथ देवी-देवताओं के थान पर धोक लगाते हैं, लेकिन ईनाणा गांव में ऐसा नहीं है। इस गांव में शादी के बाद दूल्हा और दुल्हन सबसे पहले माताजी के थान पर एक साथ धोक लगाते हैं। इसके बाद, दूल्हा अकेला ही दौड़ता हुआ अपने कुल देवता श्री खेड़ा धणी बाबा के देवरे तक जाता है। वहां वह धोक लगाकर गांव में सुख-समृद्धि और शांति की कामना करता है। राहगीर जब दूल्हे को बिना दुल्हन के दौड़ते हुए देखते हैं, तो वे अचंभित रह जाते हैं। गौ-रक्षक बाबा के बलिदान से जुड़ी है परम्परा दरअसल, यह परम्परा ईनाणिया गौत्र के कुल देवता श्री खेड़ा धणी बाबा के बलिदान से जुड़ी है। माना जाता है कि बाबा ने गायों की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी थी। वे अपने प्राणों की परवाह किए बिना दौड़ते हुए गायों को बचाने गए थे और घायल अवस्था में भी सभी गायों को सुरक्षित वापस लाकर वीर गति को प्राप्त हुए थे। कुल देवता के इसी साहस और बलिदान को सम्मान देने के लिए, गांव में शादी के बाद दूल्हा भी उन्हीं की तरह देवरे तक दौड़कर जाता है और उनके आशीर्वाद से सुख-शांति की कामना करता है। इस तरह, ईनाणा गांव की यह परम्परा आज भी एकता और पुरानी विरासत का बेहतरीन उदाहरण पेश कर रही है। बोले- गायों के लिए जान देने को तैयार नविविवाहित वासुदेव इनाणिया ने बताया कि यह एक सदियों पुरानी परम्परा है जिसमें यह सन्देश है कि गायों कि रक्षा के लिए हमें तुरंत बाद घर छोड़ना पड़े तो हम घर छोड़कर अपने प्राण न्योछावर करने के लिए तैयार हैं। वहीं अनिरुद्ध इनाणिया बताते हैं कि ऐसा माना जाता है कि इस परम्परा को निभाने से गांव में सुख समृद्धि बनी रहती है और नव दम्पति के आनंदमय जीवन की कामना यहां की जाती है। गोरक्षा के लिए कुल देवता के बलिदान की गाथा को परम्परा के रूप में जीवंत रखते हुए ईनाणा गांव के ग्रामीण आज भी गोरक्षा का प्राण अपने वैवाहिक जीवन की शुरुआत के साथ लेते हैं जो वाकई काबिले तारीफ है।


