ग्वालियर हाईकोर्ट की एकल पीठ ने बलात्कार और पॉक्सो एक्ट के गंभीर मामले में दायर याचिका को खारिज करते हुए एफआईआर रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी द्वारा दिए गए तर्क जैसे डीएनए रिपोर्ट का नकारात्मक होना, एफआईआर दर्ज करने में देरी और लंबे समय तक चले संबंधों में सहमति होने का दावा ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें केवल ट्रायल के दौरान ही परखा जा सकता है। धारा 482 के तहत एफआईआर रद्द करने का कोई ठोस आधार नहीं बनता। पीड़िता ने 7 वर्षों तक शोषण का लगाया आरोप पीड़िता ने दतिया जिले के बड़ोनी थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। उसके अनुसार 2019 से 2025 तक आरोपी ने शादी का झांसा देकर और धमकी देकर लगातार संबंध बनाए। जब पीड़िता के परिवार ने उसकी सगाई तय की, तो आरोपी ने बदनाम करने की धमकी देकर सगाई तुड़वा दी। बाद में शादी करने से भी मुकर गया। इन आधारों पर पुलिस ने आरोपी के खिलाफ बलात्कार और पॉक्सो एक्ट की धाराओं में केस दर्ज किया। आरोपी ने कहा-सहमति से थे संबंध आरोपी की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि एफआईआर दर्ज होने के समय पीड़िता की उम्र 21 वर्ष थी। दोनों के बीच वर्षों तक सहमति से संबंध रहे। यह भी बताया कि यह एक “टूटा हुआ प्रेम संबंध” है, न कि कोई आपराधिक मामला। आरोपी ने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला भी दिया। हाईकोर्ट ने दलीलें खारिज कीं कोर्ट ने कहा कि सहमति वास्तव में थी या शादी का झांसा देकर संबंध बनाए गए यह तथ्यात्मक मुद्दा है, जो ट्रायल में ही तय हो सकता है। धमकी, भावनात्मक दबाव और वादाखिलाफी जैसे आरोप गंभीर हैं, जिनकी जांच आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी कहा कि नकारात्मक डीएनए रिपोर्ट पुराने संबंधों या शोषण को पूरी तरह नकार नहीं सकती। इसलिए एफआईआर रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। 4 दिसंबर को अगली सुनवाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन के सभी पहलुओं की जांच ट्रायल कोर्ट ही करेगा। हाईकोर्ट स्तर पर FIR खत्म नहीं की जा सकती। इस मामले में अगली सुनवाई 4 दिसंबर को होगी।


