राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी इमारत का निर्माण बिना अनुमति के अवैध रूप से किया गया है, तो उसे सीज करने से पहले उसमें बैठे किरायेदार को नोटिस देना या उसकी सुनवाई करना कानूनी रूप से जरूरी नहीं है। जस्टिस सुनील बेनीवाल की कोर्ट ने भीलवाड़ा के एक दुकानदार की याचिका खारिज करते हुए 2 दिसंबर 2025 को यह रिपोर्टेबल जजमेंट दिया। कोर्ट ने माना कि अवैध निर्माण के मामले में केवल संपत्ति के मालिक को नोटिस देना ही पर्याप्त है। भीलवाड़ा के आनंद धाम मंदिर परिसर स्थित दुकान नंबर-5 के किरायेदार कृष्ण गोपाल अजमेरा ने नगर निगम की सीज की कार्रवाई के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि वह 2020 से दुकान का किरायेदार है और उसने 21 लाख रुपये एडवांस दे रखे हैं, लेकिन निगम ने उसे बिना कोई नोटिस दिए 26 अगस्त 2025 को दुकान सीज कर दी, जो ‘नैसर्गिक न्याय’ (Natural Justice) के सिद्धांतों के खिलाफ है। किरायेदार को सुनने की जरूरत नहीं मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि निर्माण संपत्ति के मालिक (श्रीनाथ मंदिर मंडल ट्रस्ट) द्वारा किया गया था, इसलिए नोटिस भी केवल मालिक को ही दिया जाना जरूरी था। कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा– “याचिकाकर्ता, जो केवल एक अधिभोगी (Occupier) है, को न तो सुने जाने की आवश्यकता थी और न ही उससे यह अपेक्षा की जा सकती थी कि वह अनुमति और स्वीकृत नक्शे के संबंध में अधिकारियों को संतुष्ट करेगा। इसलिए, याचिकाकर्ता को नोटिस दिए बिना की गई कार्यवाही को कानून का उल्लंघन नहीं कहा जा सकता।” पूरा निर्माण होने के बाद भी हो सकती है कार्रवाई याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि राजस्थान नगर पालिका अधिनियम, 2009 की धारा 194 के तहत कार्रवाई केवल तब की जा सकती है जब निर्माण कार्य चल रहा हो। चूंकि दुकानें बहुत पहले बन चुकी थीं, इसलिए यह कार्रवाई गलत है। इस पर सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) राजेश पंवार ने तर्क दिया कि निर्माण के लिए कभी अनुमति नहीं ली गई थी, इसलिए यह अवैध है। कोर्ट ने एएजी के तर्क से सहमति जताते हुए स्पष्ट किया कि धारा 194 के तहत कार्रवाई केवल निर्माणाधीन इमारतों तक सीमित नहीं है। यदि निर्माण पूरा हो चुका है लेकिन वह बिना अनुमति के बना है, तो भी निगम के पास उसे सीज करने या गिराने का पूरा अधिकार है। मालिक ने नोटिस का जवाब नहीं दिया कोर्ट ने पाया कि नगर निगम ने ट्रस्ट (मालिक) को 14 मई और 26 अगस्त 2025 को दो बार नोटिस जारी किए थे, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। कोर्ट ने कहा कि मालिक की चुप्पी के कारण निगम द्वारा की गई सीज की कार्रवाई कानून सम्मत है। कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि अगर याचिकाकर्ता सीज की कार्रवाई से व्यथित है, तो वह एक्ट की धारा 194(12) के तहत निदेशक, स्थानीय निकाय के समक्ष अपील कर सकता है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कानून के अनुसार अपील करने की छूट दी है।


