यह सिर्फ एक नौकरी की खबर नहीं है, यह आशा, संकल्प और इंसानियत की जीत की कहानी है। राजधानी रांची के दिशाएं रेस्टोरेंट ने समाज के सामने एक प्रेरणा स्थापित किया है। उन्होंने बौद्धिक रूप से दिव्यांग (इंटेलेक्चुअली डिसेबल्ड) दो युवा छात्रों अमर चौधरी और तेजस सर्राफ को अपने सर्विस स्टाफ में शामिल करके यह साबित कर दिया कि योग्यता, सहानुभूति की मोहताज नहीं होती। ओनर हर्ष ठक्कर व अभिनव शाह बताते हैं कि इस नेक पहल की चिंगारी उन्हें दिल्ली में मिली। उन्होंने वहां के मैरियट होटल में सुनाई न देने वाले स्टाफ को कुशलता से काम करते देखा। वहीं, उन्होंने संकल्प लिया कि जब वे अपना रेस्टोरेंट शुरू करेंगे, तो समाज के ऐसे विशेष सदस्यों को जरूर मौका देंगे। उनका यह संकल्प आज रांची की जमीन पर एक जीवंत मिसाल बन गया है। दो विपरीत पृष्ठभूमि के परिवारों के लिए सम्मान अमर चौधरी के माता-पिता नामकुम के आरा गेट के पास गांव की हाट में बैग बेचकर गुजर-बसर करते हैं। आज उनके बेटे ने अपनी पहली नौकरी पाकर, उनके संघर्ष को एक गौरवशाली पहचान दी है। वहीं, तेजस सर्राफ संपन्न परिवार से आते हैं। फिर भी उनके माता-पिता का मानना है कि सबसे बड़ा धन है अपने पैरों पर खड़े होना। वे कहते हैं कि यह ट्रेनिंग और अनुभव ही उन्हें सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर बनाएगा। परिवार का मानना है कि समाज इन जैसे युवाओं को मंच दें। क्योंकि, जब अवसर मिलता है, तब विकलांगता पीछे छूट जाती है और क्षमताएं आगे निकल आती हैं। दीपशिखा ने सिखाया उड़ना व पंख फैलाना इस सपने को जमीन पर उतारने का श्रेय जाता है दीपशिखा स्पेशल स्कूल के एडल्ट स्किल ट्रेनिंग यूनिट को। यह संस्थान सालों से इन विशेष युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहा है। यहां की कार्यकारी निदेशक सुधा लिह्ला ने इस साझेदारी को ‘आत्मविश्वास का निवेश’ बताया। उन्होंने कहा, हमारे छात्रों को दिशाएं में ऑन-द-जॉब ट्रेनिंग दी जा रही है। स्टाफ कदम से कदम मिलाकर इन्हें सपोर्ट कर रहे हैं। रेस्टोरेंट के पूरे स्टाफ को संवेदनशीलता का प्रशिक्षण दिया गया है, ताकि वे सहयोग का माहौल बना सकें। हमारा लक्ष्य सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि ये बच्चे लंबे समय तक अपनी जगह बनाए रखें। खाना परोसता युवक। रेस्टोरेंट में बौद्धिक दिव्यांग बच्चे। दिव्यांग दिवस


