राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्य पीठ ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने नौकरी से बर्खास्त एक कॉन्स्टेबल को बड़ी राहत प्रदान की है। कहा कि किसी कर्मचारी को बर्खास्त करना उसकी ‘आर्थिक मौत’ (Economic Death) के समान है, इसलिए ऐसा निर्णय लेते समय ठोस सबूतों का होना अनिवार्य है। जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में नागौर के मेड़ता सिटी निवासी याचिकाकर्ता कॉन्स्टेबल शंकरराम की याचिका को स्वीकार करते हुए उसे तत्काल प्रभाव से सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है। नौकरी के नाम पर ठगी या उधार का विवाद? मामला नागौर जिले की मेड़ता सिटी तहसील के सिराधना निवासी कॉन्स्टेबल शंकरराम से जुड़ा है। शंकरराम ने 24 सितंबर 2008 को पुलिस सेवा जॉइन की थी। आरोप था कि वर्ष 2009-2010 में, जब वह प्रोबेशन काल में थे, उन्होंने पुलिस ट्रेनिंग सेंटर में कैंटीन चलाने वाले ठेकेदार रिछपाल सिंह से उनके बेटे भूपेंद्रसिंह को पाली जिले में कॉन्स्टेबल की नौकरी दिलाने का झांसा दिया। आरोप के मुताबिक, शंकरराम ने इसके बदले 1 लाख 30 हजार रुपए मांगे और 50 हजार रुपए एडवांस के तौर पर अपने और अपने चचेरे भाई के खाते में जमा करवाए। चार्जशीट से बर्खास्तगी तक का घटनाक्रम इस मामले में 4 मई 2015 को शंकरराम को चार्जशीट जारी की गई। विभागीय जांच के बाद अनुशासनिक अधिकारी ने 29 नवंबर 2016 को उसे ‘दो वार्षिक वेतन बढ़ोतरी’ रोकने की सजा सुनाई। याचिकाकर्ता ने इस सजा के खिलाफ अपील की, लेकिन अपीलीय अधिकारी ने 29 सितंबर 2017 को मामले को यह कहते हुए रिमांड पर वापस भेज दिया कि सजा अपर्याप्त है। इसके बाद अनुशासनिक अधिकारी ने 14 नवंबर 2017 को सजा बढ़ाकर ‘चार वार्षिक वेतन वृद्धि’ रोकने का आदेश दिया। मामला यहीं नहीं रुका। आईजी (जोधपुर रेंज) ने समीक्षा अधिकारी के रूप में राजस्थान सिविल सेवा (CCA) नियम-1958 के नियम 32 के तहत ‘स्वतः संज्ञान’ लेते हुए कार्यवाही शुरू की। आईजी का तर्क था कि निचली अथॉरिटी का आदेश तर्कसंगत नहीं था। अंततः 15 मई 2018 को आईजी ने पिछले सभी आदेशों को रद्द करते हुए कॉन्स्टेबल शंकरराम को ‘सेवा से बर्खास्त’ करने का आदेश जारी कर दिया। हाईकोर्ट में गूंजी दलीलें: गवाह मुकरे, FR लगी, फिर भी सजा दी याचिकाकर्ता की ओर से वकील ने कोर्ट में आईजी के आदेश को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि जिस ‘नियमित विभागीय जांच’ के आधार पर कार्रवाई होनी चाहिए थी, उसमें अभियोजन पक्ष अपना केस साबित ही नहीं कर पाया। सरकार का पक्ष, पुलिस में नैतिक पतन स्वीकार्य नहीं राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए वकील ने बर्खास्तगी का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि पुलिस बल एक अनुशासित संगठन है और इसमें ईमानदारी के उच्चतम मानकों की अपेक्षा की जाती है। उन्होंने कहा कि आपराधिक मामले में बरी होना या गवाहों का मुकर जाना विभागीय जांच में क्लीन चिट की गारंटी नहीं है, क्योंकि विभागीय जांच ‘संभावनाओं की प्रबलता’ पर आधारित होती है। कोर्ट का फैसला: आईजी ने मनमाना अधिकार प्रयोग किया दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस फरजंद अली ने माना कि आईजी ने अपनी शक्तियों का मनमाना उपयोग किया है। कोर्ट ने कहा कि अनुशासनिक अधिकारी का 27 पेज का विस्तृत आदेश था, जिसे ‘नॉन-स्पीकिंग’ कहना गलत था। कोर्ट ने अपने निर्णय में लिखा- “प्रारंभिक जांच की सामग्री को सजा का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता, जब वह सामग्री नियमित जांच के दौरान रिकॉर्ड पर नहीं आई हो। आईजी ने नियमित जांच में गवाहों के पलटने और पुलिस की एफआर को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।” कोर्ट ने अपने फैसले में कानून की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘प्रारंभिक जांच’ का उपयोग केवल यह तय करने के लिए किया जा सकता है कि विभागीय जांच शुरू की जाए या नहीं। एक बार जब नियमित विभागीय जांच शुरू हो जाती है, तो सजा का आधार केवल वही सबूत हो सकते हैं, जो नियमित जांच के दौरान रिकॉर्ड पर आए हों। फैसले के मुख्य अंश


