आखिर पीथमपुर में भोपाल के यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे को लेकर इतना गुस्सा क्यों है, इसके जवाब में लोग रामकी एनवायरो इंडस्ट्रीज के आसपास के चार गांवों की मिट्टी और पानी दिखाने लगते हैं। पानी अपना रंग बदल चुका है और मिट्टी ऐसी हो गई है कि घास भी नहीं उगती। लोग इसके लिए रामकी इंडस्ट्रीज को ही जिम्मेदार मानते हैं, जहां 358 मीट्रिक टन जहरीला कचरा जलाने के लिए लाया गया है। लोगों का कहना है कि इसी कचरे के 10 टन सैंपल को जलाने का जब ट्रायल हुआ था, तब से इलाके में कैंसर और पैरालिसिस के मरीज बढ़ गए हैं। फसलें बौनी हो रही हैं। ऐसे में सरकार इसे यहां जलाने की जिद पर अड़ी रही तो वे उग्र आंदोलन करेंगे। दैनिक भास्कर ने रामकी एनवायरो इंडस्ट्रीज की फैक्ट्री से सटे तारपुरा, बरदरी, सिलोटिया और दो किलोमीटर दूर अकोलिया गांव का दौरा कर लोगों से बात की और जमीनी हालात समझे। लोगों का गुस्सा कचरे से ज्यादा रामकी इंडस्ट्रीज को लेकर है। यही वजह है कि जब जहरीला कचरा पीथमपुर में इस इंडस्ट्री में जलाने के लिए लाया गया तो वे सड़कों पर उतर गए। 1 जनवरी को भोपाल से भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच रवाना हुआ कचरा अगले दिन तड़के पीथमपुर में रामकी इंडस्ट्रीज की फैक्ट्री में पहुंच गया। सुबह शुरू हुए विरोध प्रदर्शन ने शाम होते-होते हिंसक रूप ले लिया। दो लोगों ने आत्मदाह की कोशिश भी की। पढ़िए, ग्राउंड रिपोर्ट… जानिए, फैक्ट्री के आसपास के 4 गांवों के हालात… 1. तारपुरा: पानी इतना प्रदूषित कि कुएं को ढंकना पड़ा, घर-घर में खुजली के मरीज
रामकी एनवायरो इंडस्ट्रीज की फैक्ट्री से सटे तारपुरा गांव की आबादी 5000 से ज्यादा है। गांव के भीतर भारी पुलिस बल मौजूद है, जो लोगों को घरों से बाहर नहीं निकलने दे रहा है। सुबह 11 बजे तारपुरा में एक चक्कर लगाने के बाद यह पुलिस बल गांव के अंदर आने वाले रास्ते के पास जाकर इकट्ठा हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले यहां कम लोग ही रहते थे। लेकिन जब से यहां फैक्ट्रियां आईं, बाहरी लोगों की आबादी काफी बढ़ गई है। यूका के कचरे की वजह से पूरे इलाके में डर का माहौल है। लोग बोले- जब से रामकी फैक्ट्री आई, तब से समस्या बढ़ गई
तारपुरा की रहने वाली संगीता प्रजापति बताती हैं कि मेरा परिवार कई पीढ़ियों से यहां रहता है। पहले हमारे यहां कोई समस्या नहीं थी। सब स्वस्थ थे। खेती भी ठीक होती थी। पानी साफ-सुथरा था। 2006 में यहां जब रामकी इंडस्ट्री आई तो उन्होंने हमसे झूठ बोला। इससे अच्छा तो सरकार हमें गोली मार देती
संगीता कहती हैं- 2015 में भोपाल गैस त्रासदी का कचरा रामकी इंडस्ट्री में जलाया गया। उसके बाद से तो हमारे पूरे गांव पर आपदा सी आ गई। यहां हर घर में खुजली के मरीज हैं। अचानक कैंसर के कई मरीज हो गए हैं। तब तो सिर्फ 10 टन कचरा ही जला था, अब जब इतना सारा कचरा जलेगा तो पता नहीं हम लोगों का क्या होगा? इससे अच्छा तो यही होता कि सरकार हमें सीधे ही गोली मार देती। 2. बरदरी: बोरवेल का पानी खराब, सिंचाई के लिए दो किमी दूर से लाना पड़ रहा
रामकी इंडस्ट्रीज के पीछे बसे बरदरी गांव की आबादी 4000 के करीब है। लोगों का कहना है कि एक समय था, जब यहां बढ़िया खेती होती थी। ग्रामीणों का मुख्य पेशा ही किसानी था लेकिन कुछ ही सालों में सब कुछ बदल गया। पिछले एक साल में ग्रामीणों ने यहां 200 एकड़ से ज्यादा जमीन बेच दी। जिस जगह से फैक्ट्री का पानी निकलता है, वहां जमीन पर घास भी नहीं उग रही है। ढलान वाले इस पूरे मैदान में घास है लेकिन जिस जगह से फैक्ट्री से निकलने वाला पानी बहता है, उस पूरे रास्ते की जमीन खाली है। आसपास जहां खेती हो रही है, वहां के बोरवेल से भी जहरीला पानी आने की वजह से लोग अपने खेतों तक अपने खर्चे पर दो-तीन किलोमीटर दूर से पानी की पाइप लाइन लाए हैं। इसी पानी का उपयोग वो खेती के लिए कर रहे हैं। मजबूरी में जमीन बेचनी पड़ी, खेती नहीं हो तो क्या करें
बगदरी के आत्माराम रघुवंशी बताते हैं कि हमारे गांव में प्रदूषित पानी की बड़ी समस्या है। हम लोग इतने परेशान हो गए हैं कि औने-पौने दामों पर अपनी जमीन बेचनी पड़ रही है। खेती नहीं हो रही है तो और क्या करते? यहां कैंसर के बहुत मरीज हैं। जब से कंपनी आई है, तब से हम लोगों का जीना मुश्किल हो गया है। 3. सिलोटिया: लोग बोले- फसलें बौनी, धीरे-धीरे आम के पेड़ खत्म हो गए
फैक्ट्री से ही सटा हुआ तीसरा गांव है सिलोटिया। आबादी करीब 600। ग्रामीणों का कहना है कि प्रदूषित पानी की वजह से फसलों की पैदावार कम हुई है। फसलों की ऊंचाई भी घट गई है। सिलोटिया के नागेश्वर चौधरी अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं- जगह-जगह हरियाली थी। अच्छी फसल होती थी। आम के पेड़ भी खूब थे। मालवा माटी के लिए हमारे यहां एक कहावत है “पग-पग रोटी, डग- डग नीर”। ऐसा ही हमारा गांव था। जहां खोदो, वहीं से साफ पानी मिल जाता था। 10 साल पहले जब रामकी कंपनी में कचरा जलाया गया तो हमें यह आश्वासन दिया गया कि इससे कोई नुकसान नहीं होगा। गांव के सीधे-सादे लोगों ने प्रशासन की बात मान ली। लेकिन इसके बाद गांव वालों के दिन एकदम बदल गए। हमारे गांव में एक भी आम का पेड़ नहीं बचा। हमारी फसलों को भी ऊंचाई नहीं मिल पाती। गेहूं की फसल दो-तीन फीट से ज्यादा बड़ी होती ही नहीं है। गांव का पूरा पानी प्रदूषित हो गया है। न आम के पेड़ रहे, न खेतों की हरियाली। आम के पेड़ों को तो छोड़िए, आज हर घर में चर्म रोग से पीड़ित एक व्यक्ति है। कैंसर के भी कई मरीज हैं। 4. अकोलिया: नदी का पानी प्रदूषित, खेतों में लाते हैं तो झाग निकलता है
रामकी इंडस्ट्री से 2 किलोमीटर की दूरी पर अकोलिया गांव है। लगभग 5000 आबादी के इस गांव से अगरेट नदी बहती है। यह आगे जाकर चंबल नदी में मिलती है। नदी का पानी पूरी तरह प्रदूषित हो गया है। लोग इसे खेतों में इस्तेमाल नहीं कर पाते। ग्रामीणों का कहना है कि जब हम इसे खेतों में ले जाते हैं तो यह काफी झाग देता है। इस पानी को पीकर कई जानवर मर चुके हैं। लोग भी बीमार पड़े हैं। गांव का जलस्तर खराब हो गया है। लोग फिल्टर किया हुआ पानी ही पीते हैं। अकोलिया के रहने वाले राधेश्याम पटेल बताते हैं कि पिछले सात-आठ साल में मेरे घर के चार लोगों की कैंसर से मौत हो चुकी है। 10 साल पहले हमारे गांव में एक भी कैंसर का पेशेंट नहीं था। लोगों को सामान्य बीमारियां ही होती थीं। गांव में सब तरीके से खुशहाली थी, लेकिन अब तो हालत एकदम बदल गए हैं। गांवभर में कैंसर और पैरालिसिस के मरीज हो गए हैं। यह सब पिछले 10 साल में ही हुआ है। हम सभी को लगता है कि इसके लिए यूनियन कार्बाइड से आया 10 टन कचरा ही जिम्मेदार है, जिसे 10 साल पहले रामकी ने जलाया था। अब बात हमारे बच्चों की जिंदगी और मौत पर आ गई
राधेश्याम कहते हैं कि 3 जनवरी को पूरा गांव ही विरोध में धरने पर बैठा हुआ था। तब धार कलेक्टर ने हमें भरोसा दिलाया कि कचरा यहां नहीं जलाया जाएगा। इस बात को मानकर हम लोगों ने अपना धरना खत्म किया था। अगर हमारे साथ धोखा हुआ और थोड़ा सा भी कचरा यहां जलाया गया तो इसके लिए प्रशासन ही जिम्मेदार होगा। हम प्रशासन को बता देना चाहते हैं कि लोग चुप नहीं बैठेंगे। अब बात हमारे बच्चों की जिंदगी और मौत पर आ गई है। 6 तारीख के बाद अगर समाधान नहीं मिला तो हम फिर प्रदर्शन करेंगे। समिति का दावा- रामकी कचरा निष्पादन में सक्षम ही नहीं
पीथमपुर बचाओ समिति के अध्यक्ष हेमंत हिरोले ने कहा कि हम इस कचरे का विरोध अभी नहीं पिछले 13 साल से कर रहे हैं। हम नहीं चाहते हैं कि जो घटना 3 दिसंबर 1984 को भोपाल में हुई, वैसी त्रासदी पीथमपुर में भी हो। हम तो मानते हैं कि रामकी प्लांट इस कचरे का निष्पादन करने के लिए सक्षम ही नहीं है। पहले जिस कचरे को इसके द्वारा खत्म किया गया है, उसी से पूरे पीथमपुर का पानी बर्बाद हुआ है। अब इस जहरीले कचरे को जलाएंगे तो क्या हालात होंगे? हमारी आने वाली पीढ़ियां खत्म हो जाएंगी
हेमंत का कहना है कि यह सब मिलकर झूठ बोल रहे हैं। प्रशासन से हमारी मांग है कि जैसे यह कंटेनर्स आए हैं, वैसे के वैसे ही यहां से वापस जाएं। जहां पर कोई मनुष्य न हो, कोई जीव-जंतु न हो, ऐसी जगह पर इसे नष्ट करें। लोगों ने इस खतरे को समझ लिया है। वे जानते हैं कि यह कितना खतरनाक है। यह हमारी आने वाली पीढ़ियां खत्म कर देगा, इसीलिए लोगों ने आत्मदाह तक की कोशिश की है। हमने इस संबंध में राष्ट्रपति को भी पत्र लिखा है। दिल्ली में भी अपना विरोध दर्ज कराया है। 6 जनवरी को हाई कोर्ट में सुनवाई है। अगर फैसला पीथमपुर के लोगों के पक्ष में नहीं आया तो लोग फिर से एक बार बड़े आंदोलन की तैयारी में हैं, जिसका जिम्मेदार सिर्फ प्रशासन होगा। कई साल तक असर दिखेगा, कैंसर के केस बढ़ेंगे
कैंसर विशेषज्ञ डॉ. सुखविंदर सिंह नय्यर ने बताया कि जबलपुर हाईकोर्ट में इसको लेकर हमने एक रिट पिटीशन लगाई है, जो सोमवार को अपीयर होगी। डॉ. सुखविंदर कहते हैं कि भोपाल, इटली, कोरिया जहां भी ऐसे छोटे-बड़े हादसे हुए हैं, उनको लेकर ब्रिटिश जनरल, हार्वर्ड की प्रेस्टीजियस स्टडी की गई है। इसमें कहा गया है कि वे इंसीनरेटर जिनके अंदर हैवी मेटल्स, गैस, डीप फ्लोरोंस और डायटोसिंस है, वो सबसे ज्यादा खतरनाक हैं। कई किलोमीटर दूर तक और कई सालों तक इसके असर देखने को मिलते हैं। इन क्षेत्रों में कैंसर के केस देखे गए हैं। रामकी ने कहा- जो सरकार कह रही, वही 100 प्रतिशत सही
रामकी एनवायरो इंडस्ट्रीज के कम्युनिकेशन ऑफिसर रमेश बिसरा से जब भास्कर ने उनका पक्ष जानने की कोशिश की तो उन्होंने कहा- हम इस संबंध में कोई भी बात नहीं कर सकते हैं। इस संबंध में पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ही बात करेगा। मैं आपसे बस यही कह सकता हूं कि सरकार जो भी बात कह रही है, वह सौ प्रतिशत सही है। कलेक्टर बोले- पहले जो कचरा जलाया, उसका कोई दुष्प्रभाव नहीं
भास्कर ने धार कलेक्टर प्रियंक मिश्रा से भी इस मुद्दे पर बात की। उनसे पूछा- रामकी के आसपास के गांव वालों का कहना है कि 2015 में कचरा जलाने के बाद कैंसर जैसी बीमारी गांव में आम हो गई? इस पर उन्होंने जवाब दिया- इंडस्ट्रियल एरिया के अलावा नॉर्मली भी कई बार इश्यूज क्लब कर दिए जाते हैं। मैं इस विषय में एक्सपर्ट नहीं हूं। जब यह बात हमारे सामने आई तो हमने भोपाल एम्स से डॉक्टरों की टीम बुलाई थी। जांच के बाद हम यह बहुत निश्चित तौर पर कह रहे हैं कि यह 10 टन कचरा जलाने की वजह से नहीं हुआ है। जो बीमारियां हो रही हैं, यह सामान्य इंडस्ट्रियल प्रदूषण के कारण हुई होंगी। दोनों इश्यूज आपस में क्लब हो रहे हैं। यूनियन कार्बाइड के जहरीले कचरे की ये खबरें भी पढ़ें…. पीथमपुर में पुलिस पर पथराव, जवाब में चली लाठियां:यूनियन कार्बाइड के कचरे का विरोध, महिला को घसीटा यूनियन कार्बाइड का 337-टन जहरीला कचरा 40 साल बाद हटा:भोपाल से 250km दूर पीथमपुर ले गए 40 साल बाद उठा यूनियन कार्बाइड का जहरीला कचरा:भोपाल से पीथमपुर के लिए निकले 12 कंटेनर 3740 रु. किलो में पीथमपुर में जलेगा यूका का कचरा: इसके खिलाफ जर्मनी में भी हो चुके प्रदर्शन यूनियन कार्बाइड का 337 टन जहरीला कचरा पीथमपुर जा रहा:लोडिंग में जुटे 400 एक्सपर्ट-कर्मचारी भोपाल की यूनियन कार्बाइड का जहरीला कचरा पीथमपुर पहुंचा:300 पुलिस जवान तैनात; विरोध में सांसद जहरीले कचरा का विरोध:इंदौर महापौर बोले- जनता के विचारों और चिंताओं को ध्यान में रखना जरूरी यूका का जहरीला कचरा ईंट-भट्टे बराबर टेम्परेचर पर जलेगा


