भास्कर न्यूज | जालंधर किशनपुरा स्थित कालिका धाम में भक्तों की ओर से दुख निवारण चंडी महायज्ञ करवाया गया। आचार्य इंद्रदेव काली (बबलू पंडित) ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ भक्तों से हवनकुंड में आहुतियां डलवाईं। उन्होंने कहा कि जैसे सूरजमुखी का फूल दिनभर सूरज का पीछा करता है, सूरज के साथ अपनी दिशा बदलता है और रात के समय भी उस ओर मुड़ जाता है, जहां से सूरज उगता है, यही प्रेम का प्रतीक है। इसी तरह एक सच्चा भक्त भी हमेशा भगवान से जुड़ा रहता है। वह दिनरात अपनी भक्ति में लीन रहता है, और यह नाता एक निरंतर प्रेम का रूप लेता है। उन्होंने कहा कि भक्ति में एक विशेष प्रकार का समर्पण और निरंतरता होती है। यह केवल उस प्रेम का अनुभव करना नहीं, बल्कि भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा और समर्पण की भावना भी है। भक्त की भक्ति किसी स्वार्थ या लेन-देन से मुक्त होती है। भगवान से मिलने के लिए जो समर्पण और प्रेम चाहिए, वह केवल उस व्यक्ति के द्वारा महसूस किया जा सकता है, जो सच्चे दिल से भगवान के प्रति निष्ठावान हो। यही कारण है कि भक्ति में न कोई शर्त होती है, न ही कोई अपेक्षा। यह सिर्फ प्रेम है, जो खुद से बाहर कुछ नहीं चाहता। इसलिए, प्रेम और भक्ति का वास्तविक रूप वही है, जिसमें कोई अपेक्षा, स्वार्थ या लेन-देन न हो। यह पूरी तरह आत्मसमर्पण और भगवान के प्रति निरंतर प्रेम का प्रतीक है। यह एक गहरी शांति की खोज है, जो हर भक्त के जीवन में एक ठोस उद्देश्य बनकर सामने आती है। कार्यक्रम के अंत में भक्तों ने दरबार में माथा टेककर अपने परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना की। किशनपुरा स्थित कालिका धाम में करवाए समागम में हवन करते श्रद्धालु।


