पिछले एक दशक में पति-पत्नी के पारिवारिक विवाद तेजी से बढ़े हैं। इसका सीधा असर बच्चों पर पड़ रहा है। शहर की फैमिली कोर्ट में बच्चों की कस्टडी और भरण-पोषण के मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि पति-पत्नी के बीच सामान्य नोक-झोंक अलगाव का कारण नहीं बननी चाहिए, क्योंकि इसका सबसे बड़ा खामियाजा बच्चों को भुगतना पड़ता है। पारिवारिक न्यायालय बार एसोसिएशन जयपुर के पूर्व अध्यक्ष डीएस शेखावत के अनुसार वर्ष 2020 में जहां कस्टडी केस 600 थे, वहीं अब इनकी संख्या बढ़कर 1200 हो गई है। माता-पिता को बच्चों से प्यार, पर उनके लिए साथ नहीं रहना चाहते मां की मौत, पिता ने नाना से मांगी बेटी की कस्टडी चौमूं के दंपती के बीच विवाद चल रहा था। राजीनामे के बाद बच्ची मां के पास थी। मां की मौत हो गई, बच्ची नाना के पास चली गई। अब पिता ने नाना से कस्टडी के लिए कोर्ट में अर्जी लगाई है। कोर्ट ने पिता को बेटे से मिलाने को कहा, मां नहीं मिला रही एक बैंक मैनेजर ने अस्पताल में काम करने वाली पत्नी से तलाक का केस किया। 5 वर्षीय बेटे की कस्टडी के लिए पिता की अर्जी पर कोर्ट ने मिलने की अनुमति दी, लेकिन पत्नी उसे मिलवा नहीं रही।
मां ने मांगी कस्टडी: पति-पत्नी दोनों डॉक्टर हैं। 12 साल का बेटा पिता के पास रह रहा है। मां चाहती है कि बच्चा उसके साथ रहे। मामला कोर्ट में लंबित है। भास्कर एक्सपर्ट-दीपक चौहान, अधिवक्ता
अदालत बच्चों के सर्वोत्तम हित पर ध्यान देती है। धारा-26 के तहत बच्चों की शिक्षा और भरण-पोषण से जुड़े अंतरिम आदेश देती हैं। संभव हो तो माता-पिता को बातचीत से विवाद सुलझाने चाहिए, ताकि बच्चों का भविष्य प्रभावित न हो।


