मध्यप्रदेश में ट्रांसपोर्टिंग कॉस्ट (माल ढुलाई) राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। नीति आयोग के मुताबिक माल ढुलाई का राष्ट्रीय औसत 11.5% है, यानी 100 रुपए के सामान की ढुलाई पर 11.50 रुपए खर्च आता है, लेकिन मप्र में यह 16% है। यानी मप्र में 100 रुपए का सामान ढुलाई के बाद 116 रुपए का हो जाता है। आटा-दाल से लेकर निर्माण सामग्री तक की कीमत इसकी वजह से बढ़ जाती है। इसका सीधा असर परिवार के बजट पर पड़ा रहा है। इसके उलट गुजरात में ट्रांसपोर्टिंग कॉस्ट राष्ट्रीय औसत से भी काफी कम यानी 5 प्रतिशत ही है। महाराष्ट्र में ये 8 प्रतिशत है। हालांकि केंद्र ने ट्रांसपोर्टिंग कॉस्ट को 9.5 फीसदी तक लाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। गुजरात और महाराष्ट्र में इन्फ्रास्ट्रक्चर अच्छा
मप्र में माल-ढुलाई दर 16% है तो ये अंतर सिर्फ दूरी या ट्रक-रूट तक ही सीमित नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे मप्र में लॉजिस्टिक नेटवर्क, रोड-इन्फ्रास्ट्रक्चर से लेकर मल्टी-मॉडल विकल्पों की कमी है। वहीं गुजरात-महाराष्ट्र में बेहतर गोदाम, रेल/पोर्ट कनेक्टिविटी, बेहतर रोड नेटवर्क और बिजनेस इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास हुआ है। जिससे वहां माल ढुलाई लागत कम है। मप्र में किस पर कितना असर तीन बड़ी वजहें… जिनके कारण मप्र में ज्यादा है माल ढुलाई दर 1. खराब सड़कें, लागत निकलने के बाद भी टोल
यह सबसे बड़ी वजह है। टोल वसूली के बाद भी सड़कों की हालत खराब है। मप्र की 56 टोल सड़कों पर 7300 करोड़ रुपए लागत आई है, जबकि इनसे 9800 करोड़ रुपए की वसूली हो चुकी है। इसके बाद भी अधिकतर सड़कों पर मेंटेनेंस के नाम पर अगले 12 साल टोल वसूली जारी रहेगी। इन पर ट्रकों से प्रति टोल 250 रुपए और भारी वाहनों से 500 रुपए तक टोल लिया जाता है। तीन प्रमुख टोल सड़कें भोपाल-देवास, लेबड़-जावरा और जावरा-नयागांव के निर्माण और मेंटेनेंस में 2025 तक 1300 करोड़ की लागत आई है, जबकि इन तीनों सड़कों पर 6000 करोड़ से ज्यादा की टोल वसूली हो चुकी है। 2. ईंधन की कीमत ज्यादा मप्र में ईंधन अन्य राज्यों से महंगा है। भोपाल में डीजल 91.82 रु. प्रति लीटर है। दिल्ली में 87.66, उप्र में 87.74, व मुंबई में 89.95 रु. है। इससे ट्रांसपोर्टिंग कॉस्ट ज्यादा पड़ रही है। 3. चेक पॉइंट पर वसूली शुरू
मप्र में टोल पर चेक पोस्ट केंद्र के दखल के बाद हटा दिए गए। इससे माल वाहनों के पास होने में राहत मिली लेकिन अब उनकी जगह चेक पॉइंट ने ले ली है। नतीजतन फिर से वसूली की शिकायतें बढ़ रही हैं। टोल से नहीं कमाया जा सकता बेजा लाभ
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, सड़क जनता की संपत्ति है। इसलिए टोल का उपयोग बेजा लाभ कमाने में नहीं लिया जा सकता। लेकिन यहां टोल वालों के दो तरह के खाते हैं, जिससे सही जानकारी सामने नहीं आ पाती। भोपाल बायपास में ऑपरेटर्स ने 10 साल में 149 करोड़ रुपए टोल वसूला। सरकार ने अपनी निगरानी में लिया तो 5.5 साल में ही 270 करोड़ रुपए वसूल लिए। इधर, एमपीआरडीसी के एमडी भरत यादव का कहना है कि इन सड़कों पर आगे भी टोल वसूली जारी रहेगी। इससे सरकार को भी आय होती है। एक्सपर्ट व्यू – ट्रांसपोर्ट के खर्च का 70% टोल-डीजल में
मप्र में औसतन हर 60 से 40 किमी पर टोल है। टोल रोड की कॉस्ट वसूली जा चुकी है, फिर भी उनकी अवधि बढ़ा रहे हैं। प्रदेश में ट्रांसपोर्ट भाड़े का 70% खर्चा टोल और डीजल का है। मप्र में पेट्रोल, डीजल की कीमत अन्य राज्यों से ज्यादा है। मप्र में ट्रांसपोर्टिंग कॉस्ट कम करने की दिशा में सरकार को काम करने की बहुत जरूरत है।
राजेंद्र त्रेहान, चेयरमैन, इंदौर मोटर एवं ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन, मेंबर-ऑल इंडिया मोटर कांग्रेस मैनेजिंग कमेटी


