सांसद ने वंदे मातरम् को राष्ट्र की आत्मा बताया:बोले- राष्ट्र जागरण का महामंत्र; राष्ट्रगीत की 150वीं वर्षगांठ पर राज्यसभा में हुई विशेष चर्चा

राज्यसभा में राष्ट्रगीत वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर विशेष चर्चा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर सांसद डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने वंदे मातरम् को राष्ट्र जागरण का दिव्य महामंत्र बताया। उन्होंने कहा कि यह गीत पिछले डेढ़ सौ वर्षों से देशवासियों में देशभक्ति, स्वाभिमान, त्याग और समर्पण की भावना का संचार कर रहा है। डॉ. सोलंकी ने वंदे मातरम् को स्वतंत्रता का मूल मंत्र, बलिदान, ऊर्जा, तपस्या और कर्तव्य का प्रतीक बताया। उनके अनुसार, यह मंत्र निराशा के अंधकार में भी आशा की ज्योति प्रज्ज्वलित करता है। उन्होंने इसे केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक चेतना का प्रतिबिंब कहा, जिसमें हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति और अध्यात्म समाहित है। उन्होंने बताया कि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वर्ष 1875 में आनंद मठ में वंदे मातरम् की रचना की थी। इस रचना ने सोई हुई राष्ट्र-आत्मा को जगाने का कार्य किया। इसके ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए 24 जनवरी 1950 को भारत की संविधान सभा ने सर्वसम्मति से इसे राष्ट्रगीत का दर्जा प्रदान किया। ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ में वंदे मातरम् की अहम भूमिका डॉ. सोलंकी ने कहा कि वर्तमान में जब भारत आत्मनिर्भरता और विकास की नई यात्रा पर अग्रसर है, तब वंदे मातरम् की भावना और अधिक प्रासंगिक हो गई है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के संकल्प को मजबूत करने में वंदे मातरम् की भूमिका पर जोर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि वंदे मातरम् तब सजीव और सार्थक रूप में जीवित रहता है, जब किसान खेत में परिश्रम करता है, सैनिक सीमा पर डटा रहता है, शिक्षक विद्यार्थियों में संस्कार बोता है और युवा नवाचार से देश का नाम रोशन करता है। डॉ. सोलंकी ने संसद में वंदे मातरम् गाए जाने की मांग की डॉ. सोलंकी ने कुछ लोगों द्वारा समय-समय पर वंदे मातरम् पर अनावश्यक प्रश्न उठाने पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि फांसी के तख्ते पर चढ़ते समय भी क्रांतिकारियों के होठों पर वंदे मातरम् ही होता था। यह गीत हर युग में राष्ट्रभक्ति का सर्वोच्च उद्घोष रहा है। उन्होंने सदन के माध्यम से यह आग्रह भी किया कि जब संविधान सभा ने वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में मान्यता दी है, तो संसद के भीतर भी इसे पूरे सम्मान और गौरव के साथ गाया जाना चाहिए।अंत में डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी ने कहा कि वंदे मातरम् केवल मातृभूमि को प्रणाम भर नहीं है, बल्कि यह संकल्प है कि हम अपने भारत को समृद्ध, सुरक्षित और गौरवशाली बनाएंगे।

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