प्रदेश में हो रही संरक्षित खेती से आने वाले समय में देश भर के किसान नवाचार सीखेंगे। यहां बस्सी-झांझड़ा में संरक्षित खेती के लिए एक हजार से ज्यादा ग्रीन हाउस, पॉली हाउस लगाए गए हैं। किसान आधुनिक तकनीक से खेती करने में माहिर हो चुके हैं। पॉली हाउस में 50 डिग्री से अधिक व सर्दियों में माइनस 4 तक के तापमान में भी खेती संभव है। एक-एक करके हजार से भी ज्यादा पॉली हाउस स्थापित होने के कारण इस क्षेत्र को मिनी इज़राइल के रूप में नई पहचान मिली है। अब यह पहचान देश के अलग- अलग राज्यों तक भी पहुंचेगी। कृषि विश्वविद्यालयों से जुड़े वैज्ञानिकों के लिए यहां के किसानों की सफलता शोध का विषय है। वे यहां के किसानों की उपलब्धियों से अपने राज्य के किसानों को रूबरू करवा रहे हैं। साथ ही उन्हें संरक्षित खेती करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। उन्होंने बस्सी झाझड़ा की संरक्षित खेती के मॉडल को सफल माना है। कृषि वैज्ञानिकों ने संरक्षित खेती की तकनीकों को पूरे देश में अपनाने पर सहमति जताई है। इसकी कार्ययोजना बनाकर केंद्र सरकार को भेजी जाएगी। श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. बलराज सिंह ने बताया कि अनेक विवि के कुलपतियों और कृषि वैज्ञानिकों ने यहां की संरक्षित खेती के मॉडल को अपने यहां लागू करने पर काम शुरू किया है। फसल चक्र अपनाने से और भी फायदा यहां के अधिकतर किसान टमाटर, हरी मिर्च, खीरे, ककड़ी सहित अन्य सब्जियां उगा रहे हैं। जयपुर, दिल्ली जैसे शहरों में सब्जियों की डिमांड ज्यादा होने से किसानों को अच्छी आमदनी हो रही है। वैज्ञानिकों के अनुसार इसमें फसल चक्र अपनाने से और भी फायदा संभव है। इन गांवों में खीरे का उत्पादन बड़े स्तर पर किया जा रहा है। ऐसे में फसल चक्र से भावों में गिरावट से बचा जा सकता है। ई-मित्र या राज किसान एप से घर बैठे कर सकते हैं आवेदन हालांकि संरक्षित खेती में कई चुनौतियां भी हैं। इसमें लागत ज्यादा है। तकनीकी ज्ञान भी जरूरी है। आपदाओं का खतरा, विशेष रोग, कीटों, निमेटोड और स्थिर बाजार सुनिश्चित करना जैसी कई चुनौतियां हैं। पॉली हाउस लगाने के लिए अगल- अलग श्रेणी के किसानों को 95% तक सब्सिडी दी जा रही है। प्रदेश के लघु एवं सीमांत सहित सभी किसान इस योजना का फायदा ले सकते हैं। ई- मित्र या राज किसान एप से घर बैठे आवेदन किया जा सकता है। इसके लिए जमाबंदी नकल, आधार कार्ड, मिट्टी व पानी की जांच रिपोर्ट, अनुमोदित फर्म का कोटेशन, सिंचाई स्रोत का प्रमाण- पत्र आदि जरूरी है।


