जेल एडीजी रूपिन्दर सिंघ से बातचीत:बंदियों ने 20 मिनट में दिखाई जेल की जिंदगी, पहले दिन की पीड़ा, चुभती रातें और दूसरे बंदियों का बर्ताव

जेल में बंदियों को काम और उसका मेहनताना देने के लिए नई इंडस्ट्री पनपा रहे हैं। इससे बंदी अपना समय काम में लगाने के साथ ही कमाई पर करने लगे हैं जिसकी राशि बाहर जाने पर उनके पुनर्वास में काम आएगी। बीकानेर आए जेल एडीजी रूपिन्दर सिंघ ने रविन्द्र रंगमंच में पत्रकारों से बातचीत की। उन्होंने कहा कि जेल इंडस्ट्री को अपग्रेड कर रहे हैं। नई इंडस्ट्री में नए प्रॉडक्ट तैयार किए जाने लगे हैं जिनमें साबुन, फिनाइल शामिल है। अब हैंडलूम की बजाय पॉवरलूम पर काम किया जाने लगा है। बीकानेर जेल में आर्ट एंड क्राफ्ट का अच्छा काम हो रहा है। कालीन बनाने का काम फिर से शुरू करने पर विचार किया जा रहा है। पआरएसी के जवानों को तैनात किए जाने से बेहतर परिणाम सामने आए हैं। इससे जेल प्रशासन पर काम का दबाव कम हुआ है। प्रदेश की जेलों में स्टाफ की समस्या रहती है। इसे दूर करने के लिए 803 प्रहरी और 70 डिप्टी जेलर की भर्ती की जा रही है। एडीजी ने कहा कि देशभर में खुला बंदी शिविर में राजस्थान पहले नंबर पर है। जल्दी ही इनकी संख्या में और बढ़ोतरी होगी। जेल में बंदियों के पास मोबाइल, जेल में जैमर, हार्डकोर अपराधियों का गिरोह बनाकर काम करना, उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे चैलेंज बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे जेल महकमा भी अपनी क्षमता, साधन-संसाधन बढ़ा रहा है। इससे पहले गृह विभाग की संयुक्त सचिव पूजा पार्थ और एडीजी ने बीकानेर केन्द्रीय कारागृह का निरीक्षण किया। बंदियों और जेल स्टॉफ से बातचीत की। ब्रांस बैंड और आर्केस्ट्रा ने बांधा समां जेल के खुला शिविर बंदियों ने आर्केस्ट्रा और ब्रास बैंड की स्वर लहरियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। ‘मेरे देश की धरती’ ‘रंग शरबतों का’ ‘चलते-चलते मेरे ये …’ जैसे गीतों और उन पर वाद्य यंत्रों की धुनों ने दर्शकों का मन मोह लिया। ब्रासबैंड और आर्केस्ट्रा ने संयुक्त रूप से राजस्थानी गीत पेश किए। केन्द्रीय कारागृह की ओर से बंदियों के इस मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम को ‘आशाएं’ नाम दिया गया। कार्यकम में मुख्य अतिथि रूपिन्दर सिंघ और विशिष्ट अतिथि संयुक्त सचिव गृह पूजा पार्थ थीं। दोनों अतिथियों के साथ ही बीकानेर रेंज के आई ओमप्रकाश ने भी अपने विचार रखे और बंदियों की कला को सराहा। जेल अधीक्षक सुमन मालीवाल ने प्रतिवेदन पढ़ा। कार्यक्रम का संचालन संजय पुरोहित ने किया। प्रस्तुति देने वाले बंदी पुरस्कार दिया गया और कार्यक्रम के सहयोगियों को सम्मानित किया गया। इस दौरान बीडीए सचिव अपर्णा गुप्ता, जिला परिषद सीईओ सोहनलाल, एसपी कावेन्द्रसिंह सागर, बीएसएफ डीआईजी अजय लूथरा सहित अनेक अधिकारी मौजूद थे। जेल में बंदी का पहला दिन। सलाखों के पीछे की रात। माहौल। दूसरे बंदियों का बर्ताव। अच्छे बंदी। बदमाश बंदी। जेलकर्मियों की ड्यूटी। इन सब के बीच बदलती मानसिकता। यह सब देखने को मिला रविन्द्र रंगमंच पर। मौका था, खुला शिविर के बंदी कलाकारों की ओर से मंचित नाटक ‘नया सवेरा’ का। बंदी कलाकारों ने 20 मिनट के नाटक में जेल की जिंदगी को मंच पर उतार दिया। बंदी के जेल में दाखिल होने से लेकर सजा काटकर बाहर निकलने तक के सफर को इतनी खूबसूरती से पेश किया कि लगा ही नहीं कि नाटक का मंचन है। देखन वालों के सामने मंच की साज-सज्जा तो बिल्कुल जेल की जैसी थी ही, बंदियों ने अपने अनुभव से शानदार अभिनय कर प्रत्येक सीन का सजीव बना दिया। मंच पर दिखाया गया कि एक बंदी जब जेल में जाता है तो पहला दिन और रात उसे कैसे काटने को दौड़ती है। क्योंकि, बाहरी दुनिया, दोस्त, घर-परिवार, रिश्तेदारों से अलग वो बिल्कुल दूसरी दुनिया में पहुंच जाता है। जहां उसे एक तरफ मिलते शातिर अपराधी और बदमाश प्रवृत्ति के लोग। दूसरी तरफ न चाहते हुए भी अनजाने में जेल पहुंचे सकारात्मक सोच लोग अच्छे लोग। बंदियों ने अपने अभिनय से दिखाया कि दो भाई एकसाथ जेल में पहुंचते हैं। उनमें से एक बदमाश बंदियों के साथ और दूसरा सकारात्मक सोच के बंदियों के साथ रहने लग जाता है। अच्छे बंदियों के साथ रहने और जेल के नियमों, अधिकारियों का अनुसरण करने वाला अपनी सजा पूरी होने से तीन साल पहले रिहा हो जाता है और उसका भाई नहीं छूट पाता। बंदियों ने अपने अभिनय से रंगमंच में मौजूद अधिकारियों, दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। स्क्रिप्ट सुनीलाम पुरोहित की और परिकल्पना जेल अधीक्षक सुमन मालीवाल और निर्देशन सुरेश पूनिया का था।

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