लोकायुक्त के हाथ बांधे…:भ्रष्टाचार के 309 केस में अभियोजन स्वीकृति नहीं मिल रही, कई 9 साल पुराने

नगर निगम सागर का मामला। सहायक यंत्री लखन लाल पर 2012 में लोकायुक्त ने आय से अधिक संपत्ति की शिकायतों पर छापा मारकर कार्रवाई की। 2015 में जांच पूरी हो गई। अभियोजन यानी केस चलाने की स्वीकृति के लिए सरकार को केस भेजा। नौ साल बीत गए, केस की मंजूरी अटकी है। इस बीच 2021 में वे रिटायर्ड हो गए। ये अकेला मामला नहीं। मप्र में ही ऐसे 309 मामले हैं। जाहिर है सरकार ने ही लोकायुक्त के हाथ बांध रखे हैं। नतीजा भ्रष्ट अधिकारी-कर्मचारी लोकायुक्त की कार्रवाई के बावजूद महत्वपूर्ण पदों पर डटे हुए हैं। पहले तो जांच और सुबूत जुटाने का लंबा समय। फिर सरकार से अभियोजन स्वीकृति का सिर्फ इंतजार…। भास्कर के पास ग्वालियर के 60 मामलों की पूरी सूची है जिनमें अभियोजन की मंजूरी का इंतजार है। प्रदेशभर के 309 भ्रष्टाचार के मामले अभियोजन स्वीकृति के नाम पर शासन के पास लंबित है। भोपाल मुख्यालय में फाइलें धूल खा रही हैं। लोकायुक्त के पूर्व महानिदेशक अनिल कुमार कहते हैं कि इससे भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरी लड़ाई कमजोर हो गई है। खुद सरकार में बैठे जिम्मेदारों को इस पर कड़े फैसले लेने चाहिए। 6 केस से समझें… शासन को लिखे पत्र भी बेअसर, आरोपी फिर भी पदों पर सक्रिय केस 1: स्वास्थ्य केंद्र बलदेवगढ़ लेखापाल को रिश्वत लेते पकड़ा स्वास्थ्य केंद्र बलदेवगढ़ टीकमगढ़ के लेखापाल केके चतुर्वेदी को लोकायुक्त पुलिस ने वर्ष 2018 में रिश्वत लेते पकड़ा था। इस मामले में लोकायुक्त ने 2018 में ही पड़ताल पूरी कर आरोपी लेखापाल के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति के लिए प्रस्ताव भेजा था।
{6 साल से अभियोजन की मंजूरी का इंतजार है। केस 2 : स्वास्थ्य विभाग में फर्जी पदोन्नति का मामला भी अटका स्वास्थ्य विभाग में फर्जी पदोन्नति किए जाने की शिकायत 2008 में की गई थी। इस प्रकरण में लंबी जांच के बाद लोकायुक्त पुलिस ने अशोक वीरांग सहित 5 पर प्रकरण दर्ज किया। इस मामले में 2019 में अभियोजन स्वीकृति के लिए प्रकरण शासन के पास भेजा गया था।
{5 साल स्वीकृति का इंतजार है। केस 3: मुख्य अभियंता पर आय से अधिक संपत्ति का आरोप जल संसाधन विभाग के जीएस श्रीवास्तव पर 2015 में आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज हुआ। इस मामले में लोकायुक्त पुलिस ने जांच के बाद मामला दर्ज किया और अभियोजन स्वीकृति के लिए 2019 में मामला भी राज्य शासन के पास भेजा।
{ इस मामले में 5 साल स्वीकृति का इंतजार है। केस-4: सहकारी समिति के सर्वेयर को लोकायुक्त ने रिश्वत लेते पकड़ा सहकारी समिति के सर्वेयर महेंद्र पटेल को लोकायुक्त टीम ने 2019 में सर्वेयर महेंद्र पटेल को रिश्वत लेते हुए पकड़ा था। प्रकरण की पड़ताल के बाद 2020 में लोकायुक्त पुलिस ने आरोपी के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति के लिए प्रस्ताव शासन के पास भेजा था।
{4 साल स्वीकृति का इंतजार है। केस 5 : एक अफसर पर दो बार केस, कार्रवाई के बिना ही रिटायर स्वर्णरेखा नदी में लाइनिंग के कार्य के लिए 44 करोड़ रुपए के टैंडर में फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल हुआ था। मामले में कार्यपालन यंत्री जीएस श्रीवास्तव सहित 8 पर केस दर्ज हुआ। श्रीवास्तव पर इससे पहले 2015 में भ्रष्टाचार का केस दर्ज हुआ था। लेकिन वे बिना कार्रवाई रिटायर्ड हो गए।
{1 केस में 3, दूसरे में 5 साल से स्वीकृति नहीं। केस 6: आय से अधिक संपत्ति पर केस, अनुमति अब तक नहीं मिली इंदौर के तत्कालीन सहायक आयुक्त आलोक खरे पर ₹5.50 करोड़ की आय से अधिक संपत्ति मिली थी। 2023 में अभियोजन की स्वीकृति के लिए फाइल भेजी गई, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। भ्रष्टाचार का आरोपी अफसर अभी भी महत्वपूर्ण पद पर बना हुआ है।
{1 साल स्वीकृति का इंतजार है। अभियोजन स्वीकृति में देरी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर रही है भास्कर एक्सपर्ट – अनिल कुमार, पूर्व महानिदेशक लोकायुक्त पुलिस भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है, जब भ्रष्टाचार के मामलों की जांच और कार्रवाई तेजी से हो। लंबे समय तक मामले लंबित रहने से समाज को कोई लाभ नहीं मिलता। पूर्व में सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारी-कर्मचारी पर बिना मंजूरी के चालान पेश करने की व्यवस्था थी, लेकिन 2017 में सरकार ने संशोधन कर उसे भी खत्म कर दिया। अभियोजन स्वीकृति की प्रक्रिया में देरी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर रही है। भ्रष्टाचार के मामलों में अभियोजन स्वीकृति के बिना आगे की कार्रवाई संभव नहीं है। यदि शासन स्वीकृति नहीं देता, तो लोकायुक्त न्यायालय का रुख कर सकता है, लेकिन निर्णय लेना जरूरी है।

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