भारत की सबसे प्राचीन लगभग तीन अरब वर्ष पुरानी अरावली पर्वतमाला के अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश को लेकर पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों में चिंता है। निर्देश के अनुसार 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले पहाड़ों को पहाड़ नहीं माना जाएगा, जिससे उन क्षेत्रों में खनन और निर्माण गतिविधियों का रास्ता खुल सकता है। जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि अरावली की लगभग 90 प्रतिशत श्रृंखला 100 मीटर से कम ऊँचाई की है। इसी खतरे को देखते हुए कोटा में रविवार को अरावली बचाओ–देश बचाओ जन हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत की गई। किशोर सागर तालाब की पाल पर सोसाइटी हैस ईव शी इंटरनेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट के नेतृत्व में अनेक सामाजिक संस्थाओं ने मिलकर अभियान चलाया। संस्था अध्यक्ष डॉ. निधि प्रजापति ने कहा कि अरावली केवल पहाड़ नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता, संस्कृति, अस्मिता और पारिस्थितिक तंत्र की रक्षक है। यदि अरावली न होती, तो पश्चिमी, मध्य और दक्षिण भारत का बड़ा हिस्सा रेगिस्तान में बदल सकता था। उन्होंने बताया कि अरावली 300 से अधिक जीव-जंतुओं और पक्षियों का आश्रय स्थल है, पशुपालकों के लिए चारागाह है और बनास, साबरमती व लूणी जैसी नदियों का उद्गम भी यहीं से होता है। अरावली का दोहन होने पर पश्चिमी राजस्थान गंभीर जल संकट का सामना करेगा। कार्यक्रम के दौरान नुक्कड़ नाटक के माध्यम से पर्यावरणीय और सामाजिक दुष्परिणामों को दर्शाया गया। सैकड़ों लोगों और बच्चों ने उत्साहपूर्वक हस्ताक्षर कर विरोध दर्ज कराया और अरावली रहेगी तो देश रहेगा” जैसे नारे लगाए। अभियान से जुड़े यज्ञदत्त हाड़ा ने बताया कि हस्ताक्षर युक्त बैनर केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को भेजा जाएगा, ताकि पर्यावरण हित में इस निर्णय पर पुनर्विचार का अनुरोध किया जा सके।


