जबलपुर जिले में एसआईआर (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) का काम तेजी से चल रहा है। हाल ही में मध्यप्रदेश के पूर्व मंत्री और भाजपा विधायक अजय विश्नोई ने दावा किया है कि जिले में 1200 से अधिक संदिग्ध व्यक्ति हैं। विधायक ने इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को भी एक पत्र भेजा है। वहीं, हिंदू संगठन के कार्यकर्ता भी सामने आए हैं। उनका कहना है कि शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में 10 ऐसे डेरे हैं, जहां ठहरे लोग स्वयं को बंजारा मुस्लिम बताते हैं। इनके पास न घर है, न जमीन। बावजूद इसके हैरान करने वाली बात है कि इन्होंने पैन कार्ड, आधार कार्ड, मूल निवासी प्रमाण पत्र, मतदाता कार्ड, आयुष्मान कार्ड, बीपीएल कार्ड जैसे दस्तावेज बनवा लिए हैं। ये बंजारे कथित तौर पर रोहिंग्या व बांग्लादेशी हो सकते हैं। इनमें से कई संदिग्ध शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में फुटपाथों पर मूंगफली व अन्य सामग्री बेचते नजर आ रहे हैं। तमाम युवा व महिलाएं औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरी कर रही हैं। इस बीच बरेला के हिनौतियां गांव में डेरा डाले ऐसे कुछ संदिग्धों पर पुलिस-प्रशासन ने कार्रवाई कर हटाया है। लेकिन, उन्होंने नीमखेड़ा पहाड़ी के पास डेरा डाल लिया है। प्रशासन सक्रिय हुआ तो जिले भर में कई स्थानों पर इनके ठिकानों का पता चला। इस बीच दैनिक भास्कर की टीम ने दावों की पड़ताल की। जिसमें पता चला है कि संदिग्धों के पास 2003 की लेमिनेटेड मतदाता सूची मौजूद है। मतदाता सूची, जबलपुर की नहीं बल्कि पड़ोसी जिलों की है। जिसमें दर्ज उम्रदराज और मृत लोगों को अपना सगा-संबंधी बताकर ये लोग जबलपुर की मतदाता सूची में नाम जुड़वाने की कोशिश कर रहे हैं। खास बात यह है कि गोसलपुर स्थित हृदय नगर पंचायत के धरमपुरा गांव में ठिकाना बनाए सैकड़ों लोगों में से लगभग 50 मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने में भी सफल रहे हैं। पढ़िए यह रिपोर्ट… मोबाइल में नाम नहीं, संख्या से दर्ज हैं नंबर
टीम के सदस्य संदिग्धों के पास पहुंचे तो उनकी बोली, भाषा, शारीरिक बनावट में भिन्नता मिली, जो उन्हें संदिग्ध बनाती है। इनके पास जो मोबाइल फोन हैं, उनमें नाम से मोबाइल नंबर, लैंडलाइन नंबर दर्ज नहीं हैं। नाम के स्थान पर अंक लिखे गए हैं। उदाहरण के लिए 77, 102, 999 आदि। लिहाजा मोबाइल देखकर सामने वाले व्यक्ति का नाम नहीं जान सकते। इन संदिग्धों के मोबाइल की काल डिटेल, पीएसटीएन डाटा निकालने की तैयारी पुलिस, प्रशासन ने की है। किसी जांच दल द्वारा पूछताछ की जाती है तो, अपना ठिकाना बदल लेते हैं। कुछ के पास दोपहिया व चौपहिया वाहन हैं। खास बात यह है कि सभी के पहचान संबंधी दस्तावेज सीमित अवधि के अंदर बने हैं। बन गए दस्तावेज, सवालों पर साध लेते हैं चुप्पी
टीम को पता चला है कि स्थानीय समुदाय विशेष के एजेंट सक्रिय हैं। जो संदिग्धों को विभिन्न तरह के प्रमाण पत्र बनवाने में सहयोग कर रहे हैं। एमपी ऑनलाइन की तर्ज पर कार्य करने वाले कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) में मैनेजर रहा युवक संदेह के घेरे में है। हमारी बायपास के पास निवासरत कुछ संदिग्धों से चर्चा हुई। उनसे पूछा कि कहां के निवासी हैं। क्या काम करते हैं। यहां कब से हैं। साथ और कितने लोग हैं। इन सवालों पर उन्होंने चुप्पी साध ली। एसआईआर को लेकर बातचीत करने की कोशिश की, लेकिन उनकी भाषा स्पष्ट नहीं हुई। पहचान संबंधी कुछ दस्तावेज दिखाए, जिसमें उनके नाम मतदाता सूची शामिल मिले। उसके बाद काफी प्रयास के बावजूद किसी ने कुछ नहीं बोला। हिनौतिया गांव व कुछ अन्य क्षेत्रों में भी ऐसे सवालों पर संदिग्धों ने चुप्पी साधी, उनके लीडर ने पहचान संबंधी दस्तावेज दिखाकर चुप्पी साध ली। पूर्व मंत्री बोले- सघन जांच करें कि वे विदेशी नहीं जहां इनका डेरा, वहां के लोग परेशान
हिंदू सेवा परिषद के प्रदेश अध्यक्ष अतुल जैसवानी का कहना है कि जिन क्षेत्रों में इन संदिग्धों ने डेरा डाला है, वहां के नागरिक बेहद परेशान हैं। ऐसे संदिग्ध न सिर्फ जबलपुर बल्कि समूचे प्रदेश में देखे जा सकते हैं। इनकी असलियत का पता तभी चल सकता है, जब समूचे प्रदेश में एक साथ अभियान चलाकर सर्वे किया जाए। विशेष टीम का गठन किया जाए। जिसमें राजस्व, पुलिस, स्वस्थ्य एवं महिला बाल विकास का अमला शामिल रहे। ई गवर्नेंस का अमला साथ रहे ताकी मौके पर ही बायोमैट्रिक मशीन से जांच की जा सके। प्रदेश व्यापी अभियान से संदिग्धों को एक से दूसरे जिले में भागने-छिपने का मौका नहीं मिलेगा। एडीएम ने कहा- प्रशासन सजग है
एडीएम नाथूराम गौड़ का कहना है कि हाल ही में जानकारी मिली थी कि बरेला के पास हिनोतिया गांव के पास कुछ लोग, जो कि बाहरी थे, उन्हें पुलिस बल के सहयोग से हटाया गया था, जो कि शासकीय जमीन पर कब्जा किए हुए थे। जहां से भी शिकायत या फिर जानकारी मिलती है, तो कार्रवाई निरंतर जारी रहेगी।


