नागौर में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ किसानों का प्रदर्शन:किसानों ने कहा – जमीन लेकर मारने से तो अच्छा है सरकार मिलिट्री लगाकर हमें मरवा दे

सरकार हमारी जमीनों का अधिग्रहण करके हमारी जान लेने की बजाय मिलिट्री लगा कर हमें मरवा दे तो ज्यादा अच्छा होगा यह कहना है नागौर जिला मुख्यालय के नजदीकी गांवों के किसानों का जिनकी जमीन पर अधिग्रहण की तलवार लटक रही है। जमीन अधिग्रहण के खिलाफ प्रदर्शन नागौर जिला मुख्यालय के निकटवर्ती छह गांवों के किसान राजस्थान स्टेट माइंस एंड मिनरल लिमिटेड (आरएसएमएमएल) द्वारा उनकी पुश्तैनी जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश में हैं। किसानों ने आज विरोध प्रदर्शन करते हुए जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा और साफ शब्दों में कहा कि सरकार हमारी रोजी-रोटी छीनने की कोशिश कर रही है, जो हमें किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं है। ​ जमीन लेने से अच्छा है हमें मरवा दे सरकार ​पिलनवासी, मकोड़ी, ढकोरिया, गंठिलासर, बालासर और भदवासी गांवों के सैकड़ों किसानों ने अपनी जमीनें बचाने के लिए कड़ा रुख अपनाया है। किसानों का कहना है कि सरकार जिस 557 किसानों की सहमति की बात कर रही है, वह सरासर झूठ है। यहां मौजूद कोई भी किसान अपनी जमीन देने को तैयार नहीं है। धोखे से सर्वे करवाने का आरोप ​किसानों ने कंपनी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आरएसएमएमएल के कर्मचारियों ने उन्हें धोखे में रखकर सर्वे किया। वे फसल खराबे का मुआवजा दिलाने के नाम पर आए थे, और अब पता चला है कि हमने जमीन अधिग्रहण की स्वीकृति दे दी है। किसानों ने कहा कि यह जमीन हमारी सदियों पुरानी आजीविका का जरिया है। ​किसान इतने गुस्से में हैं कि उनका कहना है कि सरकार हमारी जमीनों का अधिग्रहण कर हमें उजाड़ने की बजाय मिलिट्री लगाकर हमें मरवा दे तो ज्यादा अच्छा होगा। ​ 463 हेक्टेयर जमीन अवाप्ति के लिए नोटिफिकेशन ​यह पूरा मामला आरएसएमएमएल द्वारा जिप्सम खनन के लिए भूमि अधिग्रहण से जुड़ा है। जानकारी के मुताबिक, इन छह गांवों के 274 खसरों की कुल 463 हेक्टेयर भूमि अवाप्ति के लिए नोटिफिकेशन जारी किया गया है। हालांकि इस क्षेत्र में जिप्सम, पोटाश और लिथियम जैसे बहुमूल्य खनिज प्रचुर मात्रा में हैं, लेकिन फिलहाल यहां किसान खेती कर रहे हैं। ​किसानों का आरोप है कि वे इस संबंध में पहले भी तीन-चार बार जिला कलेक्टर को ज्ञापन सौंप चुके हैं, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। किसानों ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि अपनी जमीनें बचाने के लिए अगर उन्हें अपनी जान भी देनी पड़ी तो वे पीछे नहीं हटेंगे, लेकिन जमीनें नहीं देंगे।

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