गुडडू चौरसिया/विकास| गुमला घाघरा प्रखंड मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर झलकापाठ गांव विकास और सरकारी योजनाओं की पहुंच से बहुत दूर है। आदिम जनजातियों के उत्थान के लिए चलाई जा रही योजनाओं की हकीकत यहां दम तोड़ देती है। चूंकि आदिम जनजाति समूह वाला यह इलाका अब भी पिछ़ड़ेपन का शिकार है। यही कारण है कि रोड के अभाव में रविवार को गर्भवती की जान चली गई। इसके बाद गांव की जो वास्तविक स्थिति सामने आई। उससे पता चलता है कि आजादी के 78 साल बाद भी इस गांव में विकास की रोशनी नहीं पड़ी है। गांव का भौगोलिक क्षेत्र पूरी तरह से पठारी और दुर्गम है। मानसून के मौसम में यहां के रास्ते और भी खतरनाक हो जाते हैं। झलकापाठ गांव तक सड़क का निर्माण नहीं हो पाया है। कई बार गुहार लगाने के बावजूद उनकी इस गंभीर समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं हो सका है। मामूली बीमार पड़ने पर लोग झोलाछाप डॉक्टर पर निर्भर है। गंभीर स्थिति में घाघरा और गुमला आते है। राशन लाने के लिए 20 किमी दूर सेंदार जाना पड़ता है। आंगनबाड़ी की दूरी गांव से पांच किमी है। बच्चे पढ़ने के लिए तारासिल्ली जाते है। पीने के लिए पानी की भी समुचित व्यवस्था नहीं है।


