पश्चिमी राजस्थान जहां 72 हजार वर्ग किलोमीटर में रेगिस्तान फैला है। इस सूखे इलाके में बारिश की कमी के कारण यहां खेती चुनौती है। किसान सिर्फ एक सीजन में खेती करते हैं। इसमें भी अगर टाइम पर अच्छी बारिश न हो तो फसल चौपट हो जाती है। हालांकि अब जोधपुर स्थित केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के प्रयासों से इस इलाके की तस्वीर बदली हुई नजर आती है। काजरी ने केंद्र और राज्य सरकार के प्रोजेक्ट्स धरातल पर उतारने का बीड़ा उठाया और उसमें सफलता हासिल की। सिंचाई के लिए जूझते किसानों के लिए फार्म पोंड और सोलर पंपिंग सिस्टम लगाने के साथ-साथ बागवानी खेती करने के लिए पौधे तक मुहैया कराए जा रहे हैं। 60 फीसदी तक सब्सिडी दी जा रही है। इससे किसानों को खेती से अच्छा मुनाफा हो रहा है। म्हारे देस की खेती में इस बार बात काजरी संस्थान, जोधपुर के प्रयासों की… केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) ने जोधपुर, जैसलमेर और बाड़मेर जिलों के किसानों के लिए मॉडल प्रोजेक्ट बनाए हैं। इन तीन जिलों के 14 किसानों के खेत में फार्म पोंड, सोलर पंपिंग सिस्टम, ड्रिप इरिगेशन के मॉडल प्रोजेक्ट लगाए गए हैं। काजरी के प्राकृतिक संसाधन विभाग के हेड डॉ. पीबी सांत्रा ने बताया- रेगिस्तानी जिलों की जमीन के नीचे ग्रेनाइट है। भूजल स्तर काफी नीचे जा चुका है। यहां भविष्य में पानी की किल्लत की वजह से खेती में भी तकलीफ आएगी। इसलिए इस तरह के नवाचार सभी किसानों को अपनाने चाहिए। इन इलाकों के किसान सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर थे। अब तकनीक के सहारे पूरे साल पानी उपलब्ध है और वे साल में दो फसलें ले रहे हैं। बागवानी खेती भी कर रहे हैं। अधिकारी बोले- खेती की तकनीक सुधरी, इनकम बढ़ी डॉ. पीबी सांत्रा ने बताया- प्रोजेक्ट पर पिछले तीन साल से काम चल रहा है। यह भारत सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की ओर से वित्त-पोषित कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य किसानों की खेती की तकनीक में सुधार करना और उनकी इनकम बढ़ाना है। उन्होंने बताया- योजना के तहत हमारा फोकस पारंपरिक जल स्रोतों की प्रोडक्टिविटी बढ़ाने पर होता है। योजना के तहत हम किसान के खेत की जानकारी लेते हैं। उसके कितने हिस्से में तालाब बनाया जा सकता है, यह देखते हैं। एस्टिमेट लेने के बाद प्रोजेक्ट बनाया जाता है। तालाब के साथ ही सोलर पंपिंग सिस्टम लगाया जाता है। इसके लिए खेत के हिस्से में सोलर प्लेटें लगाई जाती है। साथ ही हम किसानों को उन बागवानी और अन्य फसलों के बारे में बताते हैं, जो बहुत कम पानी में हो जाती है। जैसे बेर, अनार, नींबू, सौंफ, अंजीर आदि। किसानों को पौधे भी उपलब्ध कराते हैं। उन्होंने बताया- इस प्रोजेक्ट के तहत बारिश के पानी को स्टोर करने की तीन विधियों को धरातल पर उतारा गया। खेत में तालाब और टांके (टैंक) बनाए गए। इनके साथ सोलर प्लेटें लगाकर सोलर पंप स्थापित किए। तालाब और टांकों को इस तरह डिजाइन किया कि बारिश का पानी बहकर इनमें स्टोर हो। इस पानी से किसान सालभर ड्रिप इरिगेशन तकनीक से सिंचाई कर सकते हैं। क्या है पूरा प्रोजेक्ट
डॉ. पीबी सांत्रा ने बताया- इस प्रोजेक्ट में किसान के खेत में 1200 घन मीटर का पोंड बनाया जाता है। पोंड के पास एक मिनी सोलर पंपिंग सिस्टम 3 HP का 2 हेक्टेयर में लगाया जाता है। वर्तमान में इस प्लांट की लागत करीब 1 लाख 80 हजार रुपए आती है। इस पर सरकार की ओर से 60 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है। काजरी ने जोधपुर, जैसलमेर और बाड़मेर के 14 किसानों का चयन किया और उनके खेत में मॉडल पोंड और पंपिंग प्लांट लगाया। अब सभी किसानों को इस प्रोजेक्ट से बहुत फायदा मिल रहा है। किसान बोले- पहले सिर्फ खरीफ की फसल लेते थे
भोपालगढ़ तहसील के किसान विक्रम सिंह भाटी (64) ने बताया- मैं साल 1991 से खेती कर रहा हूं। पहले परंपरागत खेती करता था। साल में खरीफ की ही फसल लेता था। मेरे पास 21 बीघा खेत हैं। साल 2021 में काजरी के सहयोग से खेत में फार्म पोंड-सोलर पंपिंग प्लांट लगवाया। इस प्रोजेक्ट के लगाने से पहले मैं खेत के कुछ हिस्से में खेती करता था, लेकिन अब पूरे 21 बीघा में सिंचाई कर पा रहा हूं। साल में दो फसलें लेने के कारण सालाना 80 हजार रुपए की अतिरिक्त आय होने लगी है। मेरे खेत में 3 हेक्टेयर जमीन पर यह प्रोजेक्ट लगाया गया। पहले बारिश के दौरान जो पानी व्यर्थ बह जाता था, वह अब तालाब में इकट्ठा होता है। 12 लाख लीटर पानी इकट्ठा हो जाता है। विक्रम सिंह भाटी ने बताया- यह बिना किसी ट्यूबवेल के तालाब में भर रहा है। इसी पानी को सोलर पंपिंग सिस्टम के जरिए तालाब से खींचकर ड्रिप इरिगेशन तकनीक से खेतों में पाइप के जरिए पहुंचा रहा हूं। यानी सिंचाई के लिए बिजली भी खेत में ही पैदा हो रही है। काजरी ने मुझे अनार और बेर के पौधे भी उपलब्ध कराए। इस तरह खेती का कायाकल्प हो गया है। मैंने 52×72 वर्ग मीटर में अनार के पौधे लगाकर पिछले सीजन में 25 हजार रुपए कमाए। इसके अलावा 105 पौधे बेर के लगाए हैं। इनसे भी इनकम हो रही है। किसान विक्रम सिंह ने बताया- भारत सरकार 15 हजार करोड़ रुपए नरेगा स्कीम के लिए देती है। इसकी जगह अगर खेतों में पोंड (तालाब) बनाने का काम बड़े लेवल पर किया जाए तो पश्चिमी राजस्थान में पानी की कमी नहीं रहेगी। सिंचाई के लिए जूझने वाले किसानों की समस्या दूर हो जाएगी और उनकी आर्थिक दशा भी सुधरेगी। जोधपुर में औसतन 360 से 400 मिलीलीटर बारिश होती है। जिले में 22 हजार 250 वर्ग मीटर क्षेत्र में से 12.5 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में असिंचित खेती होती है। जबकि साढ़े 4 लाख हेक्टेयर के अंदर सिंचित खेती की जाती है। पूरे जिले में 57 हजार नलकूप हैं। इन नलकूपों से वही पानी निकाला जा रहा है, जो बारिश के कारण जमीन में पहुंच रहा है। इसलिए बारिश के पानी को बचाकर खेती में काम लेना चाहिए। तालाब बनने के बाद नींबू-अनार और बेर की खेती
जोधपुर जिले के गजसिंहपुरा गांव के किसान हेमाराम देवड़ा ने बताया- मेरे पास 14 बीघा जमीन है। पहले बारिश का पानी बेकार चला जाता था। खेत में एक छोटा तालाब था, लेकिन उसका पानी सूख जाता था। बारिश से जो सिंचाई हो जाती थी, उसी पर हम निर्भर थे। सरकार की योजना के तहत मेरे खेत में तालाब बनाया गया। काजरी संस्थान की ओर से मुझे बेर, नींबू और अनार के ग्राफ्टेड पौधे दिए गए। सोलर पंपिंग सिस्टम भी लगाया गया। अब बारिश के पानी से बागवानी खेती कर रहा हूं। काजरी का प्रोजेक्ट रेगिस्तान के लिए वरदान साबित हो रहा है। पहले बारिश का पानी व्यर्थ बह जाता था। अब उसी पानी से सिंचाई कर बेर और नींबू से सालाना 80 हजार की इनकम हो रही है। डॉ. पीबी सांत्रा ने बताया- हम 2021 से काम कर रहे हैं। प्रोजेक्ट लगाने के लिए हम देखते हैं कि खेत का आकार क्या है, ढलान किधर है, मिट्टी कैसी है, बारिश का पानी आने की संभावना क्या है। मॉडल प्रोजेक्ट के जरिए हम इलाके के किसानों को नवाचार के लिए प्रेरित कर रहे हैं। यह भी पढ़ें रिटायरमेंट के बाद पहाड़ काटकर बंजर जमीन पर खेती:पॉलीहाउस, सोलर-प्लांट पर मिली 75% सब्सिडी; अब खीरा-ककड़ी से बंपर कमाई अगर किसानों को सरकारी स्कीम्स की जानकारी हो तो न केवल केवल उनका जीवन बदल सकता है, बल्कि आमदनी भी कई गुना बढ़ सकती है। यह कहना है राजसमंद जिले के छोटे से गांव कनावदा के किसान रोड़ सिंह (62) का। रोड सिंह ने 30 साल हिंदुस्तान जिंक (भीलवाड़ा) में प्राइवेट नौकरी की। (पढ़ें पूरी खबर)


