विश्व हिंदी दिवस… 75 से अधिक की उम्र में भी शहर के ये हिंदी सेवी नए शब्द रच रहे हैं, नई किताबें गढ़ रहे हैं

रांची | हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिष्ठा मिल सके, इसलिए 2006 से प्रत्येक वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है। यह दिन हिंदी भाषा की बढ़ती वैश्विक पहचान और सम्मान को दर्शाने के लिए समर्पित है। हमारे शहर के कई ऐसे लोग हैं, जो हिंदी के जरिए अपनी और राज्य की पहचान वैश्विक स्तर पर बनाए हैं। 75 वर्ष से अधिक की उम्र में भी ये सक्रिय हैं, नए शब्द रच रहे हैं, नई किताबें गढ़ रहे हैं। स्त्री विमर्श व दलित विमर्श पर दो उपन्यास लिखने में हैं व्यस्त }डॉ. विनोद कुमार 5 साल के शोध के बाद इस साल वेद ऋषिकाओं पर दूसरी किताब आएगी डॉ. ऋता शुक्ल 29 किताबें छप चुकी हैं, 2 कहानी संग्रह अगले महीने आएंगे }डॉ. विद्याभूषण कवि, नाटककार, रंगकर्मी व फिल्मकार डॉ. विनोद कुमार 75 वर्ष के हैं और उनकी 12 पुस्तकें हिंदी में प्रकाशित हो चुकी हैं। उल्लेखनीय पुस्तकों के नाम है: दस रंगनाटक, पंद्रह ध्वनि नाटक, पंद्रह व्यंग्य नाटक; कथा संग्रह: अजनबी मौसम से गुज़रकर, जंगल गाथा, कविता पुस्तक: दफ़न होते हुए, नीली आग से गुज़रते हुए आदि प्रमुख हैं। हाल में प्रकाशित उनकी पुस्तक जंगल गाथा को भारत सरकार ने डिजिटाइज किया है और पूरे भारत में यह किताब ऑनलाइन उपलब्ध है। 3 पुस्तकों का द्वितीय संस्करण प्रकाशित हो रहा है। आदिवासी विमर्श पर जंगल गाथा साल भर पहले प्रकाशित हुई। फिलवक्त स्त्री विमर्श और दलित विमर्श पर दो उपन्यास लिखने में व्यस्त हैं। 76 वर्षीय डॉ. ऋता शुक्ल अपने शोधकार्य व कथाओं के लिए जानी जाती हैं। 11 उपन्यास व 15 कथा संग्रह प्रकाशित और पुरस्कृत हैं। उनकी अनेक रचनाओं का भारतीय व विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुए हैं। शिक्षा, कला, साहित्य, संस्कृति से इनका विशेष जुड़ाव रहा है। देशभर के अनेक विश्वविद्यालयों में प्रकाशित इनकी कृतियों पर शोधकार्य हुए हैं। भारतीय वैदिक वाङ्मय का गहन अध्ययन करके वेद ऋषिकाओं पर किताबें लिख रही हैं। ​इसी शृंखला में पिछले साल लोपामुद्रा पर पहला उपन्यास ‘लोपा अगस्त्य’ आया। इस साल ऋषिका सरस्वती की कथा लिखने में व्यस्त हैं। डॉ. शुक्ल को भारतीय ज्ञानपीठ युवा सम्मान, प्रसार भारती सम्मान, बंग साहित्य सम्मान आदि मिल चुके हैं। सभी प्रमुख साहित्य विधाओं में 62 वर्षों से लगातार रचनाशील व पत्र-पत्रिकाओं व पुस्तकों की दुनिया में निरंतर उपस्थित कलमकार विद्या भूषण 85 वर्ष के हैं। उन्होंने देश से लेकर प्रदेश तक के सवालों को अपने सृजन व विचार के शीर्ष पर रखा है। अबतक प्रकाशित पुस्तकें 29 हैं। 10 कविता संग्रह, 2 गीत संग्रह, 4 कहानी संग्रह, 6 आलोचना पुस्तकें, 4 समाज दर्शन, 1 नाटक (आईने में लोग), 1 उपन्यास (न कोई मील ना कोई पत्थर) 1 विविधा। संपादन कार्य: दर्जन भर पुस्तकें, 4 पत्रिकाएं। कुड़ुख व नागपुरी में ‘पठार को सुनो’ का भाषांतर। पिछले साल 5 कहानियां छपीं: अभिपुष्प, वागर्थ, विश्वगाथा, कृति-बहुमत व ककसाड़ में। 2 कहानी संग्रहों का फरवरी तक आना सुनिश्चित है।

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