आधी दवा खपने के बाद नमूना फेल की रिपोर्ट आई:तमिलनाडु में 5 साल के लिए ब्लैकलिस्टेड सप्लायर; लखनऊ में एक्शन की तैयारी

विटामिन बी दवाओं के नमूने जांच में फेल होने के मामले में यूपी मेडिकल कॉरपोरेशन एक्शन लेगा। सप्लायर कंपनी को नोटिस जारी करने के बाद ब्लैक लिस्ट करने की तैयारी है। इस मामले में एक और बड़ा खुलासा हुआ है कि सप्लायर कंपनी तमिलनाडु में पहले से ही 5 साल के लिए ब्लैक लिस्टेड है। इसके बाद भी कंपनी की दवाएं यूपी में कैसे सप्लाई होती रहीं? सूत्रों की मानें तो दागी सप्लायरों पर यूपी मेडिकल कॉरपोरेशन के नरम रवैये की वजह से ऐसा संभव हो पाया। यही कारण था कि आधी दवाएं खप जाने के बाद अब एक्शन की तैयारी की जा रही है। क्या था पूरा मामला
दरअसल, मेडिकल कॉर्पोरेशन की ओर से खरीदी गई विटामिन बी दवाओं के सभी नमूने जांच रिपोर्ट में फेल पाए गए। लैब रिपोर्ट कॉरपोरेशन को भेज दी गई है। साथ ही अस्पतालों में सप्लाई हुई दवाओं की खेप वापस लेने के लिए भी लेटर लिखा गया है। मेडिकल कॉरपोरेशन के अफसरों का भी कहना है कि जांच में दवाओं के नमूने फेल हुए हैं। किस कंपनी ने की दवा सप्लाई
सरकारी अस्पतालों में बी कॉॅम्प्लेक्स दवा की आपूर्ति का ठेका मॉर्डन लैबेरोटरिस को मिला था। कंपनी ने लाखों की तादाद में विटामिन बी की गोली आपूर्ति की है। अक्टूबर महीने में ड्रग विभाग ने वेयरहाउस से दवा के 9 नमूने लेकर जांच के लिए भेजे थे। इस दौरान बड़ी तादाद में दवाओं की आपूर्ति अस्पतालों में कर दी गई। जनवरी में लैब से आई रिपोर्ट में विटामिन बी के सभी 9 दवाओं के नमूने फेल हो गए। इस बैच के दवाओं के नमूने हुए फेल
NFI बैच नंबर वीबीटी 2446, NFI बैच नंबर वीबीटी 2458, NFI बैच नंबर वीबीटी, 2465, NFI बैच नंबर वीबीटी 2466, NFI बैच नंबर वीबीटी 2469, NFI बैच नंबर वीबीटी 2482, NFI बैच नंबर वीबीटी 2483 , NFI बैच नंबर वीबीटी 2467। तत्काल रोकने का दिया गया आदेश
लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. संजय तेवतिया ने बताया कि जिन बैच की दवाएं फेल पाई गई हैं, उन सभी पैकेट को बांटने से रोक दिया गया है। अस्पताल के मेडिकल-ड्रग स्टोर रूम में इस बैच के विटामिन बी कॉम्प्लेक्स कैप्सूल को लेकर एक बार पुनः जांच करने को कहा गया है। ऐसे सभी पैकेट वापस मेडिकल कॉर्पोरेशन भेजे जाएंगे। ऐसी दवा खाने से कोई नुकसान होने की जानकारी नहीं
मल्टी विटामिन की दवाओं को लेकर ये मान्यता है कि आमतौर पर मानक पर फेल पाए जाने के बाद भी इनसे कोई नुकसान नहीं होता है। हालांकि, मरीज को ये दवा खाने के बावजूद उम्मीद के अनुसार आराम नहीं मिलता। यही कारण है की ऐसी दवा लेने का परामर्श डॉक्टर नहीं देते। एफिकेसी में पड़ता है असर
लखनऊ के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. वीरेंद्र कुमार कहते हैं कि अगर कोई भी दवा ‘लो स्टैंडर्ड’ पाई गई है। इसका मतलब उसमें तय मात्रा में मौजूद ड्रग या साल्ट की कमी है। ऐसे में जो दवा की एफिकेसी होनी चाहिए, वह कम हो जाएगी। साथ ही इससे दवा की जो क्षमता होती वह भी प्रभावित होगी। हालांकि इससे मरीज को नुकसान होने की संभावना बेहद कम है। ऐसे मामलों में यह माना जाता है के मरीज को फायदा नहीं होता पर और इलाज के दौरान वक्त जाया होता है। राहत की बात यह है कि इसके कोई साइड इफेक्ट नहीं होते। …………………………………….. यह भी पढ़ें युवाओं में एडजस्टमेंट डिसऑर्डर हो रहा हावी:कॉन्फिडेंस लूज होने से एंजायटी का हो रहे शिकार, एक्सपर्ट बोले- स्ट्रेस कर रहा परेशान कंपटीशन के दौर में प्रोफेशनल में बदलाव का स्ट्रेस हावी हो रहा है। बड़ी संख्या में लोग एडजेस्टमेंट डिसऑर्डर का शिकार हो रहे हैं। बड़ी बात यह है कि KGMU के मानसिक रोग विभाग की OPD में लगभग 20% मरीज इसी समस्या से जूझ रहे हैं। इनमें युवाओं से लेकर बुजुर्ग और महिला व पुरुष हैं। पढ़ें पूरी खबर…

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