पूर्व सीएम अशोक गहलोत ‘अरावली बचाओ मुहिम’ के समर्थन में उतर गए हैं। गहलोत ने कहा- ये पहाड़ियां और यहां के जंगल एनसीआर और आस-पास के शहरों के लिए ‘फेफड़ों’ का काम करते हैं। ये धूल भरी आंधियों को रोकते हैं और प्रदूषण कम करने में अहम भूमिका निभाते हैं। जब अरावली के रहते हुए स्थिति इतनी गंभीर है तो अरावली के बिना स्थिति कितनी वीभत्स होगी, इसकी कल्पना भी डरावनी है। #SaveAravalli अभियान से जुड़ने की अपील
गहलोत ने खुद मुहिम में शामिल होने की घोषणा की है। अरावली संरक्षण के पक्ष में चल रहे #SaveAravalli अभियान का समर्थन करते हुए गहलोत ने अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल पिक्चर (DP) बदली। गहलोत ने बयान जारी कर कहा- यह महज एक फोटो बदलना नहीं, बल्कि उस नई परिभाषा के खिलाफ एक सांकेतिक विरोध है। इसके तहत 100 मीटर से कम ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ‘अरावली’ मानने से इंकार किया जा रहा है। अरावली के संरक्षण को लेकर आए इन बदलावों ने पूरे उत्तर भारत के भविष्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अपील की है कि वे अपनी डीपी बदलकर इस मुहिम का हिस्सा बनें। केंद्र और सुप्रीम कोर्ट फिर से विचार करें
गहलोत ने कहा- केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट से विनम्र अपील की है कि भावी पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए अरावली की इस परिभाषा पर पुनर्विचार किया जाए। अरावली को ‘फीते’ या ‘ऊंचाई’ से नहीं, बल्कि इसके ‘पर्यावरणीय योगदान’ के आधार पर आंका जाना चाहिए। पानी रिचार्ज करती है अरावली की पहाड़ियां, ये खत्म हुईं तो भयंकर जल संकट
गहलोत ने कहा- अरावली जल संरक्षण का मुख्य आधार है। इसकी चट्टानें बारिश के पानी को ज़मीन के भीतर भेजकर भूजल रिचार्ज करती हैं। अगर पहाड़ खत्म हुए, तो भविष्य में पीने के पानी की गंभीर किल्लत होगी, वन्यजीव लुप्त हो जाएंगे और पूरी इकोलॉजी खतरे में पड़ जाएगी। अरावली की छोटी पहाड़ियां भी चोटियों जितनी ही अहम
गहलोत ने कहा- वैज्ञानिक दृष्टि से अरावली एक निरंतर शृंखला है। इसकी छोटी पहाड़ियां भी उतनी ही अहम हैं जितनी बड़ी चोटियां। अगर दीवार में एक भी ईंट कम हुई, तो सुरक्षा टूट जाएगी। आधे राजस्थान में पर्यावरण को लेकर चिंता
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की ओर से अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा को मंजूरी देने के बाद उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, भीलवाड़ा, सिरोही समेत 15 जिलों यानी करीब आधे राजस्थान में पर्यावरण को लेकर चिंता गहरा गई है। यह नई परिभाषा कहती है कि आस-पास की जमीन से 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंचाई वाली भू-आकृति को ही अरावली पहाड़ी माना जाएगा। इस मानक से अरावली की 90% से ज्यादा पहाड़ियां संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी, जिसका सीधा असर खनन, रियल एस्टेट और निर्माण गतिविधियों पर पड़ेगा। नतीजे में भविष्य में मेवाड़ के रेगिस्तान में बदलने का खतरा होगा। इसके बाद से ‘अरावली बचाओ मुहिम’ चलाई जा रही है, जिसे अब पूर्व सीएम अशोक गहलोत का भी समर्थन मिला है।


