जयपुर में बॉलीवुड एक्टर मकरंद देशपांडे नाटक में बने आइंस्टीन:बच्चों को दिया आकाश में उड़ने का हौसला, न्यूजीलैंड के नाटक ‘द गिर्मिट’ ने किया भाव-विभोर

मकरंद देशपांडे ने ‘आइंस्टीन’ बनकर उस महान वैज्ञानिक की कहानी बताई, जिसने दुनिया को देखने का नजरिया बदल दिया। आइंस्टीन ने समय, अंतरिक्ष और ऊर्जा की परिभाषाएं नए सिरे से गढ़ीं, जिसने मानव सभ्यता को सोचने की नई दिशा दी। महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के किरदार में देशपांडे ने मंच पर कहानी को आगे बढ़ाते हुए दर्शाया कि उसे मां ने कभी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह कमजोर है। उसके सपनों के पंख नहीं काटे, बल्कि उन्हें और मजबूती दी। उसे खुले आकाश में उड़ने का हौसला दिया। यह भरोसा दिया कि सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि खोज की शुरुआत है। मकरंद देशपांडे के निर्देशन में नाटक ‘आइंस्टीन’ प्रस्तुत किया गया। रंगमंच, कला और संस्कृति के रंगों से रंगने वाले 14वें जयरंगम महोत्सव की गुरुवार को जवाहर कला केंद्र में शुरुआत हुई। थ्री एम डॉट बैंड्स थिएटर फैमिली सोसाइटी, कला एवं संस्कृति विभाग राजस्थान तथा जवाहर कला केंद्र जयपुर की ओर से हो रहे फेस्टिवल के पहले दिन बॉलीवुड अभिनेता और निर्देशक मकरंद देशपांडे के निर्देशन में नाटक खेला गया। वहीं नाटक व फिल्म समीक्षक-आलोचक अजीत राय की स्मृति पर संवाद हुआ। साथ ही समीना जेहरा के निर्देशन में न्यूजीलैंड की नाट्य प्रस्तुति ‘द गिर्मिट’ के मंचन ने कलाप्रेमियों को भाव-विभोर कर दिया। आइंस्टीन की जिज्ञासा सीमाओं को नहीं मानती थी
आइंस्टीन कभी ऐसा बच्चा था, जो साधारण नहीं था। दुनिया से बेखबर वो अपने ही संसार में डूबा रहता था। सोचता था कि पक्षी आपस में क्या बातें करते होंगे। शायद ये चर्चा करते होंगे कि किसकी उड़न सबसे ऊंची थी। आइंस्टीन की जिज्ञासा सीमाओं को नहीं मानती थी। स्कूल में वह अध्यापकों से ऐसे सवाल पूछता था, जिनके जवाब किताबों में नहीं थे। नतीजा यह हुआ कि उसे अलग समझकर स्कूल से निकाल दिया गया। मंच पर आइंस्टीन के किरदार में मकरंद देशपांडे बच्चों को थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी के महत्व से भी रूबरू कराते हैं, जिसे सरल और रोचक उदाहरणों के साथ समझाया गया। बताया जाता है कि जब हम काम में डूबे होते हैं तो समय कैसे बीत जाता है, और जब मन ऊबा हुआ हो तो वही समय भारी पड़ने लगता है। नाटक बच्चों को यह संदेश भी देता है कि कल्पनाशक्ति को बांधकर नहीं रखना चाहिए, बल्कि उसे हर दिशा में दौड़ने देना चाहिए। दिमाग की साइकिल पर विचारों के पैडल लगातार मारते रहो, वरना संतुलन बिगड़ सकता है। ‘अजीत राय के जाने से खो गया सिनेमा का विश्वकोष’
‘शब्द मौन रहे और जीभ लड़खड़ाती रही, सभागार में सन्नाटा छाया रहा।’ थिएटर व फिल्म समीक्षक अजीत राय की स्मृति में आयोजित संवाद की शुरुआत कुछ ऐसी शांति के साथ हुई। ‘अजीत राय– थिएटर, सिनेमा एंड एवरीथिंग इन बिटवीन’ विषय पर टॉक शो में मकरंद देशपांडे, गुलाब सिंह तंवर, धर्मेंद्र नाथ ओझा, राजकुमार रजक ने विचार रखे और सत्र का मॉडरेशन अभिषेक गोस्वामी ने किया। राजकुमार रजक ने बताया कि अजीत राय की लेखनी को पढ़कर यह बात जाहिर होती है कि समीक्षक का क्या प्रभाव होता है। उन्होंने बताया कि राय की लेखनी में नाटक की शुरुआत से लेकर अंत तक की प्रक्रिया में आम जीवन के अनुभव को रचनात्मक शब्दों में गढ़ा जाता था। अजीत राय के जीवन से यही बात सीखने को मिलती है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। धर्मेंद्र नाथ ओझा ने बताया- कला जगत में होने वाली हर घटना उन्हें बेचैन कर देती थी। वे कला व कलाकार के सम्मान की पुरजोर पैरवी भी करते थे। गुलाब सिंह तंवर ने कहा- अजीत राय का व्यक्तित्व बहुत बड़ा था। मकरंद देशपांडे ने अजीत राय के साथ बिताए सुखद पलों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अजीत राय भावनाओं के वाहक और ऊर्जा के स्रोत थे। ब्रिटिश शासन में भारतीयों की दुर्दशा की कहानी कहता है नाटक ‘द गिर्मिट’
रंगायन के मंच पर नाटक “द गिर्मिट” की बेहद संवेदनशील और प्रभावशाली प्रस्तुति देखने को मिली। नाटक में यह मार्मिक कहानी दर्शाई गई कि किस तरह ब्रिटिश शासन काल में गरीब और निरक्षर भारतीयों को बेहतर रोजगार का झूठा सपना दिखाकर उनसे कागजों पर अंगूठा लगवाया गया। फिर उन्हें फिजी व अन्य देशों में अमानवीय परिस्थितियों में काम करने के लिए भेज दिया गया। इस नाटक का निर्देशन समीना जेहरा ने किया, जबकि मंच पर इसकी सशक्त प्रस्तुति नादिया फ्रीमैन ने दी। नादिया ने अपने सधे हुए अभिनय के माध्यम से गिर्मिटिया लोगों की पीड़ा, बिछोह, असहायता और संघर्ष को गहराई से दर्शाया, जिससे दर्शक भावनात्मक रूप से जुड़ते चले गए। प्रस्तुति में ऑडियो-विज़ुअल्स का प्रभावशाली ढंग से प्रयोग कर गिर्मिटिया समाज के दर्द और उनके टूटते सपनों को जीवंत रूप में सामने रखा गया। वहीं वेस्टर्न म्यूजिक और तबले के फ्यूजन ने नाटक की भावनात्मक गहराई को और बढ़ाते हुए दर्शकों का विशेष ध्यान आकर्षित किया। तबले पर थिरकती अंगुलियों के साथ जयपुर के 16 वर्षीय मो. ज़मान ने इस अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुति में साथ निभाया।

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