81 साल के हुए दिशोम गुरु शिबू सोरेन:पिता की हत्या के बाद शुरू किया आंदोलन, मोरहाबादी आवास में जश्न, काटेंगे 81 पाउंड का केक

दिशोम गुरु शिबू सोरेन आज 81 साल के हो गए हैं। आज मोरहाबादी आवास पर अपने पूरे परिवार और कार्यकर्ताओं के साथ 81 पाउंड का केक काटेंगे। उनके जन्म दिन को लेकर मोरहाबादी स्थित उनके आवास पर जश्न का माहौल है। उनसे मिलने और बधाई देने वालों का तांता लगा रहा। ओडिशा के राज्यपाल का पद छोड़ भाजपा में शामिल हुए रघुवर दास भी उनके आवास पर पहुंचे और उन्हें बधाई दी। इसके साथ ही विधानसभा अध्यक्ष रबींद्रनाथ महतो ने भी उनसे मिल बधाई दी। 81 साल के दिशोम गुरु शिबू सोरेन का जन्म वर्तमान रामगढ़ जिले के गोला प्रखंड के नेमरा में 11 जनवरी 1944 को हुआ। गांव के ही स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा लिए दिशोम गुरु का जीवन संघर्षों भरा रहा है। महज 13 साल की उम्र के थे जब उनके पिता की हत्या महाजनों ने कर दी। इसके बाद शिबू सोरेन ने पढ़ाई छोड़ दी। पिता की हत्या के बाद पढ़ाई छोड़ कर महाजनों के खिलाफ संघर्ष का फैसला किया। ऐसे शिबू सोरेन कहलाए ‘दिशोम गुरु’ पिता की हत्या के बाद वह इस बात को समझ गए थे कि पढ़ाई से ज्यादा जरूरी है महाजनों के खिलाफ आदिवासी समाज को इकट्‌ठा करना। उन्होंने सूदखोर महाजनों के खिलाफ काम करना शुरू किया। 1970 में वे महजनों के खिलाफ खुल कर सामने आए और धान कटनी आंदोलन की शुरुआत की। सूदखोरों के खिलाफ आंदोलन चलाकर शिबू सोरेन चर्चित तो हुए, लेकिन महाजनों को अपना दुश्मन बना लिया। शिबू को रास्ते से हटाने के लिए महाजनों ने भाड़े के लोग जुटाए। उन दिनों आदिवासियों को जागरूक करने के लिए शिबू सोरेन बाइक से गांव-गांव जाते थे। इसी दौरान एक बार उन्हें महाजनों के गुंडों ने घेर लिया। बारिश का सीजन था। बराकर नदी उफान पर थी। शिबू सोरेन समझ गए कि अब बचना मुश्किल है। उन्होंने आव देखा न ताव, अपनी रफ्तार बढ़ाई और बाइक समेत नदी में छलांग लगा दी। सभी को लगा उनका मरना तय है, लेकिन थोड़ी देर बाद शिबू तैरते हुए नदी के दूसरे छोर पहुंच गए। लोगों ने इसे दैवीय चमत्कार माना। आदिवासियों ने शिबू को ‘दिशोम गुरु’ कहना शुरू कर दिया। संथाली में दिशोम गुरु का अर्थ होता है देश का गुरु। साल 2005 में 10 दिनों के लिए बने पहली बार सीएम राज्य अलग होने के बाद यह उम्मीद थी कि शिबू सोरेन पहले मुख्यमंत्री होंगे। लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका। समय बीत और वे 2 मार्च 2005 को पहली बार CM बने, लेकिन बहुमत साबित नहीं कर पाने के कारण दस दिन में ही उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद 27 अगस्त 2008 को शिबू सोरेन दूसरी बार झारखंड के CM बने। इस बार वे विधायक नहीं थे। इस कारण छह महीने में उन्हें चुनाव जीतकर विधानसभा का सदस्य बनना था। पांच महीने बाद 2009 में तमाड़ विधानसभा में उपचुनाव का ऐलान हुआ। UPA ने गठबंधन की ओर से शिबू का नाम रखा। मुंडा बहुल क्षेत्र होने की वजह से शिबू सोरेन वहां से चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे। पर मजबूरी में शिबू सोरेन ने पर्चा दाखिल कर दिया। विरोधी के रूप में झारखंड पार्टी के राजा पीटर मैदान में थे। 8 जनवरी 2009 को परिणाम आया तो CM शिबू सोरेन करीब 9 हजार वोट से उपचुनाव हार गए थे। आखिर में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। 3 बार बने सीएम पर सरकार चलाई महज 10 माह अब तक शिबू सोरेन ने तीन बार कार्यकाल संभाला है। लेकिन 10 महीना 10 दिन ही राज्य की कमान संभालने का मौका मिला। शिबू सोरेन पहली बार 2 मार्च 2005 को झारखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। वे 2 मार्च से 12 मार्च यानी कि सिर्फ 10 दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने थे। इसके बाद शिबू सोरेन दूसरी बार 28 अगस्त 2008 को झारखंड के मुख्यमंत्री बने। इस बार उन्हें पांच महीने तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का मौका मिला। उन्होंने 18 जनवरी 2009 को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। फिर तीसरी बार 30 दिसंबर 2009 को शिबू सोरेन झारखंड के मुख्यमंत्री बने। इस बार फिर उन्हें पांच महीने ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने का मौका मिला। उन्होंने 31 मई 2009 को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।

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