ब्राह्मणों पर टिप्पणी करने वाले अजाक्स के प्रांतीय अध्यक्ष और आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा की मुश्किलें बढ़ सकती है। पुलिस ने 19 दिसंबर को कोर्ट के कर्मचारी नीतूसिंह चौहान को गिरफ्तार किया। नीतूसिंह पर आरोप है कि उसने ही आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा को फायदा पहुंचाने वाले उस फर्जी अदालती आदेश को टाइप किया था। हालांकि, पुलिस को ओरिजिनल आदेश अभी तक नहीं मिला है, जिसके आधार पर राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी (एसएएस) को भारतीय प्रशासन सेवा( आईएएस) में प्रमोशन मिल गया। पुलिस ने नीतूसिंह चौहान को बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया था, लेकिन पूछताछ के दौरान मिले तथ्यों के आधार पर उसे गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है। अब पुलिस उससे उस फर्जी आदेश की टाइपिंग, उसकी प्रतियां तैयार करने की प्रक्रिया और सबसे महत्वपूर्ण, उस मूल दस्तावेज के ठिकाने को लेकर पूछताछ करेगी। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… अब सिलसिलेवार जानिए पुलिस ने क्या जांच की स्पेशल जज की कोर्ट का फर्जी आदेश किया था टाइप
पुलिस का आरोप है कि जिस समय यह कथित फर्जी फैसला लिखा गया, उस वक्त नीतूसिंह चौहान, तत्कालीन स्पेशल जज विजेंद्र रावत की कोर्ट में टाइपिस्ट के रूप में पदस्थ था। वर्तमान में वह इंदौर के कुटुंब न्यायालय में पदस्थ है। पुलिस के मुताबिक, संतोष वर्मा के पक्ष में कोर्ट का एक ऐसा आदेश तैयार किया गया, जिसका न्यायालय के आधिकारिक रिकॉर्ड में कोई अस्तित्व ही नहीं था। उसी आदेश की एक प्रमाणित प्रति शासन को प्रस्तुत कर वर्मा ने पदोन्नति हासिल कर ली, जो नियमों के साथ एक बड़ा धोखा था। इस पूरे मामले की जांच के लिए गठित विशेष जांच टीम (SIT) ने साल 2021 में अहम सबूत जब्त किए थे। SIT ने स्पेशल जज विजेंद्र रावत का कंप्यूटर सिस्टम और एक पेन ड्राइव जब्त की थी, जिसमें दो अलग-अलग निर्णयों की डिजिटल प्रतियां मिली थीं। हालांकि, इन डिजिटल प्रतियों के बावजूद, आज तक पुलिस के हाथ उस फैसले की मूल हार्ड कॉपी नहीं लगी है, जिस पर जज के हस्ताक्षर होने चाहिए थे। एसीपी कोतवाली विनोद दीक्षित के अनुसार, प्रारंभिक जांच और तकनीकी सबूतों से यह स्पष्ट हुआ है कि फर्जी निर्णय नीतूसिंह चौहान ने ही टाइप किए थे। प्रमोशन का खेल: एक नहीं, दो-दो फैसले किए गए पेश
यह मामला इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि IAS कैडर में प्रमोशन पाने के लिए संतोष वर्मा ने शासन के सामने कोर्ट के दो अलग-अलग निर्णय पेश किए थे। जब इस “बरी” वाले फैसले की सत्यता की जांच के लिए कोर्ट के रिकॉर्ड खंगाले गए, तो ऐसा कोई फैसला दर्ज ही नहीं मिला। यहीं से इस पूरे फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हुआ। टाइपिस्ट की गिरफ्तारी से बढ़ीं जज और IAS की मुश्किलें
नीतूसिंह चौहान की गिरफ्तारी के बाद इस मामले में पहले से ही आरोपी बनाए गए तत्कालीन स्पेशल जज विजेंद्र रावत और मुख्य लाभार्थी आईएएस संतोष वर्मा की मुश्किलें बढ़ना तय है। विजेंद्र रावत फिलहाल अग्रिम जमानत पर हैं, जबकि संतोष वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली हुई है। पुलिस का आरोप है कि संतोष वर्मा जांच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। एसीपी दीक्षित ने संकेत दिए कि यदि वर्मा का यही रवैया रहा, तो पुलिस उनकी जमानत रद्द कराने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है। अभियोजन और बचाव पक्ष की दलीलें यह मामला अदालतों में भी एक लंबी लड़ाई देख चुका है। अभियोजन ने कोर्ट में कहा कि संतोष वर्मा को यह पूरी जानकारी थी कि उनके केस में कोई फैसला हुआ ही नहीं है, इसके बावजूद उन्होंने प्रमाणित प्रति के लिए आवेदन किया और उसे प्रमोशन के लिए इस्तेमाल किया। हाई कोर्ट में वर्मा की जमानत पर आपत्ति लेते हुए अभियोजन ने कहा था, 17 अक्टूबर 2020 को वर्मा ने 6 अक्टूबर 2020 के फैसले की प्रमाणित प्रति के लिए आवेदन किया, जो स्वयं इस मामले में उनकी मिलीभगत को दर्शाता है। वर्मा को 6 अक्टूबर 2020 के फैसले के बारे में कैसे पता चला, यह आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया है। यह फैसला कोर्ट के ऑनलाइन सिस्टम (CMIS) पर कभी अपलोड ही नहीं हुआ था। वहीं संतोष वर्मा के वकील का कहना था कि उनके मुवक्किल को झूठा फंसाया गया। उनका तर्क है कि 6 अक्टूबर 2020 का फैसला कोर्ट की फाइल में मौजूद था और सभी अधिकारियों ने अपने बयानों में यह स्वीकार भी किया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले शीला सेबेस्टियन बनाम आर. जवाहर राज (2018) का हवाला देते हुए कहा कि वर्मा ने न तो कोई दस्तावेज जाली बनाया और न ही धोखाधड़ी की। चार साल बाद भी सबसे बड़ा सवाल: असली फैसला है कहां?
चार साल की जांच, कई गिरफ्तारियों और अदालती सुनवाइयों के बावजूद, पुलिस आज भी उसी सवाल पर खड़ी है, जहां से यह मामला शुरू हुआ था। वह मूल आदेश, जिस पर कथित तौर पर जज के हस्ताक्षर हैं, आखिर किसके पास है?


