हाई कोर्ट ने रिश्वत से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी को केवल संदेह व अपूर्ण साक्ष्य के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। मौजूदा मामले में अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग, आरोपियों की ओर से उसकी स्वीकृति और ट्रैप की तारीख पर उनका पास काम पेंडिंग रहना साबित नहीं कर पाया है। ऐसे में अभियोजन यह पेश करने में विफल रहा है कि आरोपी अपीलकर्ताओं ने बेईमानी की नीयत से कोई काम किया और उसके बदले में कीमती चीज या आर्थिक लाभ प्राप्त किया है। वहीं अदालत ने रींगस थाने में तैनात रेलवे सुरक्षा बल के तत्कालीन एसएचओ सहित दो कांस्टेबल को जयपुर मेट्रो-द्वितीय की एसीबी कोर्ट से मिली एक साल की सजा का आदेश भी रद्द कर दिया। जस्टिस आनंद शर्मा ने यह आदेश कैलाश चंद सैनी व अन्य की ओर आपराधिक याचिका पर दिया। अदालत ने कहा कि रिश्वत मामले में दोष ठहराने के लिए आरोपी के खिलाफ स्पष्ट मांग, स्वीकृति या बरामदगी सहित लंबित आधिकारिक कार्य का संदेह से परे साबित होना जरूरी है। मामले में आरोपियों की ओर से सीनियर एडवोकेट माधव मित्र व जया मित्र, राजीव सोगरवाल व गिरिराज प्रसाद शर्मा ने पक्ष रखते हुए कहा कि मामले में परिवादी के बयान ही विरोधाभासी हैं और वे परिवादी को लाभ पहुंचाने की स्थिति में नहीं थे। याचिका में कहा कि साल 2007 में चिरंजी लाल ने एसीबी, सीकर में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि रेलवे अधिनियम के तहत रींगस थाने में दर्ज एक मामले में उसका नाम हटाने के बदले आरोपी पांच हजार रुपए रिश्वत मांग रहे हैं। एसीबी ने ट्रैप कार्रवाई की और कहा कि आरोपी कांस्टेबल सांवरमल मीणा से रिश्वत राशि मिली है। एसीबी मामलों की कोर्ट ने तीनों अपीलार्थियों कैलाश सैनी, जगवीर सिंह व सांवरमल को एक-एक साल की सजा सुनाई।


