लूणकरणसर में नमक के पानी की झील पर अब तक सात हजार से अधिक प्रवासी पक्षी कुरजां पहुंच चुके हैं। खींचन में इनकी संख्या 20 हजार से अधिक हाेने का अनुमान लगाया जा रहा है। यह इस बात का संकेत है कि थार के मरुस्थलीय क्षेत्र में हमारा ईको सिस्टम अब भी काफी अच्छा काम कर रहा है। मरुक्षेत्र में हर वर्ष शीतकालीन प्रवास पर आने वाली डेमोइसेल क्रेन (कुरजां) एक बार फिर वैज्ञानिक जगत के लिए महत्वपूर्ण सूचना लेकर आई है। लूणकरणसर के साल्ट पैन क्षेत्रों में भोजन करती हुई एक रिंग लगी कुरजां की हाल ही में पहचान की गई है। यह वही वयस्क नर क्रेन है जिसे वर्ष 2017 में कजाकिस्तान के प्रसिद्ध टुसकुल लेक में वैज्ञानिक डॉ. एलेना, डॉ. वेलेंटिन, डॉ. आंद्रे गैव्रिलोव और ओलेग बेल्यालोव ने टैग किया था। 2017 में रिंगिंग के समय यह क्रेन एक वयस्क नर था और उसके साथ वाली मादा ने उस वर्ष दो चूजों को जन्म दिया था। क्रेन की टांग में लगी पीली रंग की रिंग ने एक बार फिर उसकी पहचान को संभव बनाया, जिससे उसके प्रवासी मार्ग, पड़ाव और लंबी यात्रा की जानकारी वैज्ञानिकों तक पहुंच रही है। बीकानेर के पक्षी विशेषज्ञ डॉ. दाऊ लाल बोहरा ने रिंग लगी कुरजां का फोटो विदेशी वैज्ञानिकों काे भेजकर इसकी पुष्टि की है। वैज्ञानिकों के अनुसार, टुसकुल लेक से लूणकरनसर/बीकानेर क्षेत्र की अनुमानित दूरी लगभग 3150 किलोमीटर है। लूणकरनसर, बीकानेर : कुरजां का प्रमुख भोजन-स्थल लूणकरणसर और आसपास के नमक क्षेत्र कुरजां के लिए महत्वपूर्ण भोजन स्थल बने हुए हैं। यहां के खेतों में बाजरा, मूंगफली, ग्वार और गेहूं के अवशेष तथा साल्ट पैन के आसपास की खुली भूमि इन प्रवासी पक्षियों को भरपूर ऊर्जा प्रदान करती है। यही कारण है कि इस क्षेत्र को पश्चिमी भारत का सबसे महत्वपूर्ण शीतकालीन क्रेन फीडिंग लैंडस्केप माना जाता है। कजाकिस्तान का की सेंटर टेंगिज कुर्गाल्झिन बायोस्फीयर रिजर्व कुरजां का मूल प्रजनन क्षेत्र कजाकिस्तान के विशाल घास स्थलों में स्थित है, जहां टुसकुल लेक, टेंगिज लेक और कुर्गाल्झिन बायोस्फीयर रिजर्व को इनके प्रमुख प्रजनन केंद्र के रूप में माना जाता है। यही क्षेत्र मध्य एशिया–भारत प्रवास मार्ग का अत्यंत महत्वपूर्ण नोड है। प्रवास मानचित्र कुरजां सामान्यत कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान/तुर्कमेनिस्तान के स्टेपी क्षेत्र, अफगानिस्तान के पश्चिमी पठार, पाकिस्तान के सिंध, थार क्षेत्र राजस्थान (लूणकरनसर बीकानेर) मार्ग से यात्रा करती है। यह वही मार्ग है जिसमें कई शिकार-जोखिम, विद्युत तार, जलस्रोतों की कमी और बदलते भूमि उपयोग जैसे खतरे मौजूद हैं। कुल जनसंख्या की 57% कुरजां राजस्थान आती
हैं: रिंग लगी कुरजां का राजस्थान में मिलना केवल एक अवलोकन नहीं, बल्कि प्रवास विज्ञान के लिए एक अत्यंत मूल्यवान रिकॉर्ड है। दुनिया में कुल जनसंख्या की 57% कुरजां राजस्थान में आती हैं। इससे प्रवासी पक्षियों के मार्ग, सुरक्षा क्षेत्रों, भोजन स्थलों और बदलते जलवायु प्रभावों को समझने में सहायता मिलती है।


