अलवर संसदीय क्षेत्र के सांसद एवं केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने “एक पाती अलवर के नाम” पत्र के माध्यम से अरावली पर्वतमाला को लेकर स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा है कि अरावली पूर्ण रूप से सुरक्षित है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय पर्यावरण संरक्षण, अवैध खनन पर रोक और सतत विकास के संतुलन को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। पत्र में सांसद ने लिखा कि अलवर अरावली पर्वतमाला का अभिन्न अंग है, जहाँ सरिस्का टाइगर रिज़र्व और सिलीसेढ़ झील जैसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहरें स्थित हैं। इनके संरक्षण और विकास से कोई भी समझौता नहीं किया जा सकता। भूपेंद्र यादव ने स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अरावली को लेकर दी गई परिभाषा कोई नई नहीं है। यह वही परिभाषा है जो राजस्थान में वर्ष 2002 में अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल में गठित समिति की रिपोर्ट के आधार पर पहले से लागू है, जिसके तहत स्थानीय भूमि स्तर से 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ अरावली मानी जाती हैं और उन पर खनन प्रतिबंधित है। उन्होंने पत्र में उल्लेख किया कि 100 मीटर से अधिक ऊँचाई वाली पहाड़ी केवल शिखर तक सीमित नहीं होगी, बल्कि शिखर से लेकर आधार तक का पूरा क्षेत्र अरावली पर्वत में शामिल माना जाएगा। साथ ही यदि ऐसी दो पहाड़ियाँ 500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित हैं, तो उनके बीच की संपूर्ण भूमि भी अरावली रेंज के अंतर्गत आएगी। ऐसे में यह दावा करना कि नई परिभाषा से 90 प्रतिशत अरावली नष्ट हो जाएगी, पूरी तरह निराधार है। वास्तविकता यह है कि इस परिभाषा से 90 प्रतिशत से अधिक अरावली क्षेत्र सुरक्षित रहेगा। खनन को लेकर पत्र में कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार किसी भी अवैध खनन को नियमित नहीं किया जाएगा। संरक्षित क्षेत्रों, वेटलैंड्स, नेशनल पार्क, अभयारण्यों और ईएसजेड क्षेत्रों में खनन पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगा। वैध खनन भी आईसीएफआरई द्वारा तैयार किए जाने वाले सस्टेनेबल माइनिंग प्लान के बाद ही सीमित क्षेत्रों में संभव होगा, जो कुल अरावली क्षेत्र का एक प्रतिशत से भी कम (करीब 0.19%) होगा। पत्र के अंत में सांसद भूपेंद्र यादव ने लिखा कि वे अरावली की गोद में पैदा हुए हैं और इसी पर्वतश्रृंखला के सानिध्य में पले-बढ़े हैं। अरावली के संरक्षण और संवर्धन के लिए वे पहले भी प्रतिबद्ध थे और आगे भी पूरी निष्ठा से इस दिशा में कार्य करते रहेंगे।


