गठजोड़ या इत्तेफाक : निगम के ज्यादातर टेंडर 4 फर्मों को, कीमत चुका रही जनता

भास्कर एक्सक्लू​सिव इत्तेफाक है या गठजोड़, ये तो जिम्मेदार ही जानें मगर ये साफ है कि नगर निगम के सभी टेंडर-ठेके 4 फर्मों के पास हैं। नगर निगम के करीब 90 प्रतिशत कामों के भारी-भरकम टेंडर इन्हीं के पास हैं। गुजरात से जुड़ी एक मुख्य फर्म की दो अलग-अलग ब्रांच ने टिपर और ट्रैक्टर का काम लिया हुआ है। जबकि सीवरेज क्लीनिंग और हाई-वे सफाई का काम एक ही फर्म के पास है। हैरानी ये सीवरेज क्लीनिंग और हाई-वे सफाई वाली फर्मों की देखरेख करने वाली तीसरी फर्म के पास एक काम है। इन्हीं चार ठेकेदारों के पास ज्यादातर काम मिला हुआ है। टेंडर उसे ही जाते हैं जो कम रेट कोट करती है या टेंडर शर्तें ऐसी होती हैं कि कई दूसरी फर्में छंट जाती हैं। नतीजा गठजोड़ जीत जाता है। ठेकेदार खुश, कर्मचारी खुश, शहर में काम नहीं होते और आम जन, सीवर जाम, नाले जाम, कूड़ा पड़े होने, टिपर न आने, बगैर कूड़ा लिए टिपर के घरों के सामने से निकल जाने जैसी समस्याओं से जूझते रहते हैं। दरअसल हाल ही में नगर निगम ने हाई-वे सफाई का ठेका दिया। पहले एस्टीमेट पांच करोड़ का बनाया गया। बाद में वो टेंडर 2.60 करोड़ में उठा। न्यूनतम 50 श्रमिक और 370 रुपए रनिंग किलोमीटर के हिसाब से भुगतान किया जाएगा। यहां रनिंग किलोमीटर का अलग पेच है। यानी वॉल-टू-वॉल सफाई होगी और इसके लिए सामान्य आदमी का एक किलोमीटर फर्म के लिए 4 किमी माना जाएगा। यानी आम आदमी का एक किलोमीटर सफाई होने पर फर्म को 4 किमी का भुगतान प्रति किमी 370 रुपए के हिसाब से ​किया जाएगा। यानी एक किमी में करीब 1480 रुपए का भुगतान होगा। ये काम मिला है दरबार वेस्ट सूरत वाली फर्म को। तब ध्यान में आया कि शहर की सीवरेज क्लीनिंग जिसने पूरे शहर की सीवरेज के हालत खराब कर दी वो भी इसी फर्म के पास है। वो भी आज से नहीं। करीब 6 साल से घूम-फिरकर ये काम इसी फर्म के पास आ रहा है। सामने कोई प्रतिद्वंद्वी ही नहीं है। आमजन पर असर क्या : आमजन पर असर ये है कि अगर बार-बार एक ही फर्म के पास काम आएगा तो वो जनता की नहीं सुनेगी क्योंकि उनको जनता से ज्यादा उस सिस्टम पर भरोसा है जिसके भरोसे ठेका मिलता है। आए दिन टिपर 20 प्रतिशत तक फील्ड में नहीं जाते। आम आदमी नोटिस भी करता है और शिकायत भी। ट्रैक्टर टेंडर में शर्तें थी कि 4 श्रमिक और एक ड्राइवर रहेगा मगर शहर में एक भी ऐसा ट्रैक्टर नहीं जिसमें ऐसा हो। सिर्फ एक ड्राइवर और नाबालिग बच्चा और एक महिला श्रमिक मिलेगी। मगर इसे कोई चेक करने वाला नहीं। इंस्पेक्टर्स की इनको खुली छूट है क्योंकि ट्रिप तो उनको ही भरनी है। ट्रैक्टर-टिपर का गठजोड़ भी समझें टिपर के टेंडर का मूल कार्यकाल खत्म होने के बाद इसका एक्सटेंशन किया गया। ये काम बीकानेर वेस्ट केयर के पास है। मगर इसकी मूल फर्म और ट्रैक्टर वाली मूल फर्म एक है। ट्रैक्टर का टेंडर पिछले साल ही करणी कार्पोरेशन को मिला है। इसके अलावा निगम में मशीनों का भी एक टेंडर है जो भगवती ट्रेडर्स के पास है। कई फर्मों के नाम अलग, ठेकेदार एक, इनके पास ही आते हैं ठेके नगर निगम के ठेके घूम फिरकर चार ठेकेदारों के पास जा रहा है। चारो ही ठेकेदार शहर के हैं। कमिश्नर मयंक मनीष भले ही इस सिस्टम और ​गणित को ना समझ पाएं मगर निगम का पूरा सिस्टम जरूर इसे समझता है। लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए कि कुछ ही फर्म और ठेकेदार पूरे निगम के सिस्टम को हॉयर कर चुके हैं। यही वजह है कि जूनागढ़ के पास वाले नाले के भुगतान की फाइल अभी तक निगम के पास भुगतान के लिए नहीं पहुंची। ये इसी निगम के सिस्टम की वजह से। हालात ये है कि निर्माण शाखा में मिनिस्टि्यल स्टाफ पूरी फाइलें ठेकेदारों को दे देता है। कई ऐसी फाइलें अभी भी है जिनकी पूरी फाइलें ही ठेकेदारों के पास हैं। ​आफिस से कोई एक्शन की बात होती तो निगम का ही स्टाफ ठेकेदारों को तुरंत खबर करते हैं।

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