मनरेगा के स्थान पर संसद में पारित नए कानून जी राम जी के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को रोजगार मिलेगा। इसे भ्रष्टाचार से मुक्त रखना बड़ी चुनौती होगा। मनरेगा में पिछले पांच साल में 1500 से ज्यादा गबन की शिकायतें सामने आई हैं। वर्ष 2019 से देखें तो करीब 1600 शिकायतें सोशल ऑडिट यूनिट में दर्ज की गई हैं। जिनमें लगभग 32.84 करोड़ की राशि की वित्तीय अनियमितताएं पाई गईं। जांच के बाद इनमें से 1393 मामलों का निस्तारण किया जा चुका है। इन मामलों में 30.36 करोड़ रुपए की गड़बड़ी की पुष्टि हुई है। मगर सबसे चिंताजनक पहलू है कि वसूली की रफ्तार बहुत धीमी है। अब तक 231 ऐसे मामले चिह्नित किए गए हैं, जिनमें गबन की गई राशि वसूल की जानी थी। अंतिम रूप से वसूली गई राशि मात्र लगभग 3.91 करोड़ ही रही है। वसूली का आंकड़ा 12 प्रतिशत के आसपास सिमट कर रह गया है। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार देश भर में मनरेगा के तहत शिकायतों के मामले में तमिलनाडु पहले स्थान पर है, जहां 3.32 लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए गए। इसके बाद आंध्रप्रदेश में 2.44 लाख और तीसरे स्थान पर तेलंगाना में 1.58 लाख मामले रिपोर्ट हुए हैं। इस लिहाज से राजस्थान 1591 मामलों के साथ काफी नीचे है। मगर जिलेवार आंकड़ों पर गौर करें तो भ्रष्टाचार का जाल पूरे प्रदेश में फैला हुआ नजर आ रहा है। चित्तौड़गढ़ जिले में शिकायतों की संख्या सबसे अधिक 127 दर्ज की गई, जहां 3.19 करोड़ रुपए से अधिक का गबन पाया गया। इसके ठीक पीछे जोधपुर में 122 मामलों में 3.01 करोड़ रुपए की वित्तीय अनियमितता रिपोर्ट की गई। झुंझुनूं 119, कोटा 114 और अजमेर 106 शिकायतों के साथ अव्वल जिले हैं। इनमें वसूली करने में जोधपुर जिला 79,96,103 रुपए की रिकवरी के साथ प्रदेश में सबसे ऊपर है। इसके बाद डूंगरपुर में 55,91,311 रुपए की वसूली की गई। अलवर जिले में 57.18 लाख और कोटा में 43.51 लाख रुपए की रिकवरी हुई है। जबकि अजमेर में गबन की राशि 1.82 करोड़ से अधिक थी, वहां केवल 17.35 लाख रुपए वसूले जा सके ।


