एमजीएम मेडिकल कॉलेज में रैगिंग और प्रताड़ना को लेकर सामने आई एक और शिकायत को कॉलेज प्रशासन ने जांच के बाद फर्जी घोषित करते हुए लीपापोती कर दी। मामले में डीन डॉ. अरविंद घनघोरिया ने जांच कमेटी गठित की थी। डीन का कहना है, जांच में आरोप निराधार पाए गए। हालांकि, पूरे घटनाक्रम को लेकर कॉलेज के भीतर और बाहर यह सवाल उठने लगे हैं कि कहीं मामले को दबाने के लिए जांच को ही फर्जी तो नहीं ठहरा दिया गया? गुमनाम पत्र के रूप में मिली थी शिकायत, इस पर हुई जांच कॉलेज की पहली मंजिल पर फिजियोलॉजी विभागाध्यक्ष के कार्यालय में यह शिकायत गुमनाम पत्र के रूप में मिली थी। इसमें आरोप लगाया था कि 2025 बैच के जूनियर छात्रों को 2024 बैच के सीनियर छात्रों ने निजी फ्लैट पर बुलाकर मारपीट की धमकाया और नाचने के लिए मजबूर किया। सूत्रों के अनुसार मामला गुमनाम पत्र तक सीमित नहीं था। पीड़ित छात्र के पालक द्वारा लिखित रूप से भी शिकायत दर्ज करवाई गई थी। इसके बावजूद कॉलेज प्रशासन ने शिकायत को फर्जी मानते हुए उसी दिशा में जांच आगे बढ़ाई। संयमित व्यवहार की दे रहे समझाइश डॉ. घनघोरिया का कहना है, वार्डनों को नियमित होस्टल राउंड के निर्देश दिए हैं। विभागाध्यक्षों से कहा गया कि प्रथम और द्वितीय वर्ष के छात्रों को कक्षाओं में संयमित व्यवहार को लेकर समझाइश दी जाए। कॉलेज और होस्टल परिसर में एंटी रैगिंग कमेटी के सदस्यों के नंबर भी प्रदर्शित किए गए हैं। संस्थान की छवि पर असर, साख बचाने के दबाव में जांच कॉलेज से जुड़े सूत्रों का कहना है, दो वर्षों से लगातार सामने आ रही रैगिंग की शिकायतों से संस्थान की छवि पर असर पड़ रहा है। ऐसे में मामले को सख्ती से नहीं, बल्कि तेजी से निपटाने के लिए कदम उठाए। एंटी रैगिंग कमेटी ने प्रथम वर्ष के 135 छात्रों के बयान लिए और आरोपी बताए गए छात्रों से भी पूछताछ की। जांच के बाद निष्कर्ष यह निकाला कि आरोप झूठे हैं। छात्रों का एक साल खराब हो जाता : यह भी चर्चा है कि आरोप सही साबित होते तो संबंधित सीनियर छात्रों का एमबीबीएस पाठ्यक्रम समय पर पूरा करना मुश्किल हो सकता था। एक साल का बैक होने से साढ़े पांच साल के कोर्स को पूरा करने में उन्हें छह से सात साल तक लग सकते थे। यही कारण है कि नियंत्रित रवैया अपनाया गया। एंटी रैगिंग सिस्टम पर सवाल पूरे मामले ने एंटी रैगिंग व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया है। वार्डन और फैकल्टी के बीच संवाद की कमी और छात्रों का खुलकर सामने न आना, ऐसे कारण हैं, जिनकी वजह से शिकायतें सामने आती रही हैं। दो वर्षों में रैगिंग से जुड़ी आठ शिकायतें दर्ज हो चुकी हैं। ….कार्रवाई की तैयारी डीन घनघोरिया ने कहा, जिन छात्रों के नाम शिकायत में लिखे गए थे, वे पहले से ही पुराने रैगिंग प्रकरण में निलंबित चल रहे हैं। शंका है कि उन्हें आगे भी दंडित करवाने के लिए झूठी शिकायत की गई हो। यदि शिकायत जान-बूझकर फर्जी पाई जाती है तो शिकायतकर्ता के खिलाफ पुलिस कार्रवाई हो सकती है।


