स्वदेशी मेले में आए बिहार के पहले एग्रो एक्सपोर्टर:GI टैग वाले कतरनी चावल का स्टॉल लगाएंगे; ‘मन की बात’ में मोदी भी कर चुके हैं जिक्र

बिहार के भागलपुर जिले से निकलकर गरीबी की रेखा पार करने वाले मनीष कुमार आज सालाना करीब 25 लाख रुपए का नेट प्रॉफिट कमा रहे हैं, जिसे इस साल 50 लाख तक पहुंचाने का लक्ष्य है। मनीष कुमार इन दिनों चित्तौड़गढ़ पहुंचे हैं, जहां वे स्वदेशी मेले में अपने जीआई टैग वाले कतरनी चावल का स्टॉल लगाएंगे। इस मेले में वे लोगों को ब्लू टी बनाना भी सिखाएंगे, जो पिछले कुछ सालों में सेहत के प्रति जागरूक लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुई है। दरअसल, मनीष कुमार बिहार के पहले एग्रो एक्सपोर्टर है। साल 2023 में उन्होंने दुबई और यूपी के लुलु मॉल में अपने उत्पादों की सप्लाई की। इसके बाद उनके उत्पादों की पहचान देश ही नहीं, विदेशों में भी बनने लगी। उन्हें जिला और राज्य स्तर पर कई पुरस्कार मिले। साल 2024 में वे वर्ल्ड फूड, इंडसफूड, जियल फूड और आहार जैसे बड़े इवेंट्स में भी शामिल हुए। मन की बात में पीएम मोदी भी कर चुके है जिक्र
साल 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यक्रम ‘मन की बात’ में मनीष कुमार के काम का उल्लेख किया। इससे उनका आत्मविश्वास और बढ़ा। मनीष कुमार बताते हैं कि उन्होंने हमेशा शुद्ध और सुरक्षित उत्पाद लोगों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा। कोरोना काल में जब सब कुछ बंद था, तब भी किसान ही ऐसा वर्ग था जिसके पास काम था। पढ़िए- किसान से बिजनेसमैन बने मनीष कुमार की स्टोरी किसान परिवार में जन्म, बहुत कठिन हालात में बीता बचपन
मनीष कुमार का जन्म बिहार के भागलपुर जिले के एक साधारण किसान परिवार में हुआ। उनके पिता परमानंद सिंह एक छोटे किसान थे और पारंपरिक तरीके से धान की खेती किया करते थे। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। आमदनी सीमित थी और जिम्मेदारियां ज्यादा थीं। मनीष कुमार चार बहनों और तीन भाइयों में पांचवें नंबर के पुत्र हैं। माता-पिता ने जीवन में बहुत संघर्ष देखा। उनकी मां दमयंती देवी आज 93 साल की हैं और पिता का चार साल पहले 93 साल की उम्र में निधन हो गया। बचपन अभावों में बीता, लेकिन परिवार ने कभी ईमानदारी और मेहनत का रास्ता नहीं छोड़ा। सीमित संसाधनों के बीच शिक्षा पूरी करने की जिद
गरीबी के कारण मनीष कुमार ज्यादा पढ़ाई नहीं कर पाए। उन्होंने किसी तरह ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने ज्योग्राफी ऑनर्स से ग्रेजुएशन किया। मनीष कुमार बताते हैं कि उनके चार दोस्त थे, जिनमें से तीन डॉक्टर बन गए, लेकिन आर्थिक मजबूरी के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़कर कमाई की राह पकड़नी पड़ी। पढ़ाई के दौरान ही घर की जिम्मेदारियों का बोझ उनके कंधों पर आ गया था। इसके बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी और आगे बढ़ने का रास्ता तलाशते रहे। मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव से रीजनल मैनेजर तक का सफर
ग्रेजुएशन के बाद साल 1997 में मनीष कुमार ने एक कंपनी में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के रूप में नौकरी शुरू की। मेहनत, ईमानदारी और लगन के बल पर उन्होंने धीरे-धीरे तरक्की की और साल 2007 में रीजनल मैनेजर के पद तक पहुंचे। यह उनके जीवन का स्थिर दौर था, लेकिन मन में कुछ अलग करने की इच्छा हमेशा बनी रही। नौकरी से मिले अनुभव ने उन्हें लोगों से जुड़ना, मार्केट समझना और मैनेजमेंट सीखने का मौका दिया, जो आगे चलकर उनके बहुत काम आया। नौकरी छोड़ इंस्टीट्यूट खोला, लेकिन खेती से जुड़े रहे
साल 2007 में मनीष कुमार ने रीजनल मैनेजर की नौकरी से रिजाइन दे दिया और अपना खुद का एक इंस्टिट्यूट खोला। इस संस्थान में 12वीं कक्षा से लेकर मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी कराने की व्यवस्था थी। उन्होंने कई टीचर्स को नियुक्त किया और संस्थान धीरे-धीरे अच्छी तरह चलने लगा। कई साल तक यह संस्थान उनकी आजीविका का मुख्य साधन रहा। इसी दौरान वे खेती से भी जुड़े रहे, लेकिन वह सिर्फ पारिवारिक परंपरा तक सीमित थी। कोरोना महामारी ने जिंदगी की दिशा बदल दी
साल 2019 में कोरोना महामारी आई और सब कुछ ठप हो गया। मनीष कुमार का इंस्टीट्यूट भी बंद हो गया। दो साल बाद जब संस्थान दोबारा खुला तो हालात पहले जैसे नहीं रहे। बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई में ज्यादा रुचि लेने लगे थे। उन्होंने 2023 तक संस्थान को संभालने की पूरी कोशिश की, लेकिन जब बात नहीं बनी तो उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र को पूरी तरह छोड़कर खेती को ही अपना मुख्य पेशा बनाने का निर्णय लिया। खेती को मजबूरी नहीं, बल्कि अवसर मानकर अपनाया
मनीष कुमार बताते हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि 55 साल की उम्र से पहले उन्हें पूरी तरह खेती में आना पड़ेगा। लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें यह रास्ता दिखाया। उन्होंने तय किया कि अब वे खेती को परंपरा नहीं, बल्कि व्यवसाय बनाएंगे। उनके पास लगभग 40 बीघा जमीन है, जिस पर उन्होंने कतरनी चावल की खेती शुरू की। इसके अलावा साढ़े 12 बीघा जमीन में 668 जर्दालू आम के पेड़ लगे हुए हैं। कतरनी चावल में छिपी पहचान और खुशबू की ताकत
कतरनी चावल भागलपुर का प्रसिद्ध जीआई टैग प्राप्त उत्पाद है। यह शॉर्ट ग्रेन राइस होता है और इसमें एक नेचुरल अरोमा होता है। इसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है, जो ब्लड शुगर को मेंटेन रखता है। इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, आयरन, जिंक, विटामिन B, फाइबर होता है और कम कैलोरी होता है। यह शरीर को स्वस्थ रखता है। वजन बढ़ने का कारण नहीं होता। मनीष कुमार बताते हैं कि यह चावल सॉफ्ट होता है और बहुत टेस्टी होता है। इसकी खीर, खिचड़ी, जीरा राइस और बिरयानी बेहद अच्छी बनती है। यह चावल डायबिटीज के मरीजों के लिए भी सही माना जाता है और फैटी लिवर की समस्या को कम करने में मदद करता है। कच्चे माल से वैल्यू एडेड प्रोडक्ट तक का सफर
मनीष कुमार ने सिर्फ उत्पादन पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि मार्केटिंग और वैल्यू एडिशन पर खास जोर दिया। पैडी राइस जहां 60 रुपए किलो बिकता था, वहीं प्रोसेसिंग और पैकेजिंग के बाद वही कतरनी चावल 160 रुपए किलो तक बिकने लगा। इसके साथ ही उन्होंने ब्राउन राइस जैसे वैल्यू एडेड प्रोडक्ट भी बाजार में उतारे। उनका टैगलाइन है – “जैविक उत्पाद, मिट्टी से मार्केट तक।” जर्दालू आम की मिठास और अंतरराष्ट्रीय पहचान
भागलपुर का जर्दालू आम भी एक जीआई टैग प्राप्त उत्पाद है। इस आम में रेशे कम होते हैं और मिठास भी कम होती है। थोड़ा टेंगी टेस्ट होता है। इसमें विटामिन A, B6, C, पोटैशियम, मैग्नीशियम और एंटी ऑक्सीडेंट होता है। यह इसमें फाइबर ज्यादा और शुगर कम होता है, इसलिए डायबिटिक मरीज भी खा सकते हैं। यह पेट, आंख और स्किन के लिए भी सही होता हैं। यह अपने रंग और खुशबू के लिए जाना जाता है। भागलपुर के कृषि कॉलेज और कृषि विभाग ने कतरनी चावल और जर्दालू आम को यूनिक मानते हुए जीआई टैग के लिए प्रयास किया, जिसके बाद साल 2018 में दोनों को जीआई टैग मिला। एफपीओ बनाकर सैकड़ों किसानों को जोड़ा साथ
साल 2023 में मनीष कुमार ने “जर्दालू एंड कतरनी एग्रो फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी” नाम से एफपीओ बनाया। इसके जरिए उन्होंने अपने कार्य क्षेत्र का विस्तार किया। आज उनके एफपीओ से करीब 360 किसान जुड़े हुए हैं। सभी किसान मिलकर कतरनी चावल और जर्दालू आम की खेती करते हैं। जीआई उत्पाद होने के कारण उत्पादन सीमित है, लेकिन मांग बहुत ज्यादा है। आज सालाना करीब 25 लाख रुपए का प्रॉफिट
मनीष कुमार बताते हैं कि आज उन्हें सालाना करीब 25 लाख रुपए का नेट प्रॉफिट हो जाता है, जिसे वे इस साल 50 लाख तक ले जाना चाहते हैं। वे कोशिश कर रहे है कि उनकी एफपीओ का टर्नओवर आने वाले दस सालों में करीब 8 से 10 करोड़ रुपए तक पहुंचे। उनकी पत्नी प्रीति सिंह, जो एमए हैं, उन्हें हमेशा मोटिवेट करती हैं। वे किडजी फ्रेंचाइजी लेकर अपना स्कूल चला रही हैं। उनका बेटा दसवीं कक्षा में पढ़ता है। चित्तौड़गढ़ स्वदेशी मेले में दिखेगी बिहार की खुशबू
मनीष कुमार चित्तौड़गढ़ के स्वदेशी मेले में अपने जीआई टैग वाले कतरनी चावल के साथ पहुंचे हैं। आम का सीजन नहीं होने के कारण वे जर्दालू आम नहीं ला सके, लेकिन खुशबूदार कतरनी चावल लोगों को जरूर आकर्षित करेगा। उनके स्टॉल पर लोग ब्लू टी बनाना भी सीख सकेंगे। उनकी यह कहानी बताती है कि अगर सोच सही हो, तो गरीबी भी सफलता की राह नहीं रोक सकती।

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