मेरे माता-पिता को संतान नहीं हो रही थी। उस वक्त हमारे गांव में गुरु महाराज आते थे। उनके आशीर्वाद से हमारे माता-पिता को 3 संतान हुईं। पहले से यह तय हुआ था कि बीच वाली संतान को माता-पिता गुरु महाराज को दे देंगे। दूसरी संतान मैं था। इसलिए जब ढाई साल का हुआ, तब मां ने मुझे गुरु महाराज को सौंप दिया। तब से मैं कभी घर नहीं गया। अपनी यह कहानी संन्यासी गीतानंद महाराज ने बताई। महाराज अपने सिर पर सवा लाख रुद्राक्ष धारण किए हैं, जिनका वजन 45 किलो है। उनकी यह हठयोग तपस्या महाकुंभ मेले में आकर्षण का केंद्र बन गई है। दैनिक भास्कर की टीम ने उनकी इस तपस्या और पहले की तपस्याओं को लेकर बात की। हिंदू धर्म और मौजूदा कुंभ की व्यवस्था पर भी चर्चा की। माता-पिता को 5 साल तक कोई संतान नहीं हुई
सिर पर ढाई लाख छोटे-बड़े और दुनिया के हर किस्म के रुद्राक्ष धारण करने वाले गीतानंद का जन्म 1987 में पंजाब के कोट का पुरवा गांव में हुआ था। इस जन्म के पीछे भी एक कहानी है। असल में गीतानंद के माता-पिता को शादी के करीब 5 साल तक कोई संतान नहीं हुई। आसपास इलाज करवाया, लेकिन फायदा नहीं हुआ। उस वक्त गांव में श्री शंभू पंचदशनाम आवाहन अखाड़े के संन्यासी आया करते थे। गीतानंद का परिवार भी गुरुओं की कथा सुनने जाता था। परिवार ने एक बाबा को अपना गुरु बना लिया, उनसे दीक्षा ली। एक साल बाद गीतानंद के माता-पिता को पहली संतान हुई। इसके बाद दूसरी संतान के रूप में गीतानंद का जन्म हुआ। गीतानंद के जन्म के 2 साल बाद एक और बच्चे का जन्म हुआ। गुरु ने आशीर्वाद देते हुए माता-पिता से कहा था कि एक संतान तुम्हें हमें देनी होगी। अपने वचन को याद रखते हुए माता-पिता ने ढाई साल के गीतानंद को अपने गुरु को दे दिया। गुरु को देते वक्त उन्हें पीड़ा थी, लेकिन इस बात का संतोष भी था कि उनके पास दो और संतानें हैं। 12 साल में लिया संन्यास, 10वीं तक पढ़ाई की
गीतानंद बताते हैं- गुरुजी घर से हमें लेकर चले आए। मुझे किसी चीज की कोई जानकारी नहीं थी। संस्कृत स्कूल से पढ़ाई शुरू हुई। सबको पूजा-पाठ करते देखता, तो उसी में मन लगता। 12-13 साल का हुआ तो हरिद्वार में मेरा संन्यास कार्यक्रम हुआ और मैं संन्यासी बन गया। हालांकि उसके बाद भी पढ़ाई जारी रही। 10वीं तक की पढ़ाई के बाद स्कूल जाना छोड़ दिया। गीतानंद श्री शंभू पंचदशनाम आवाहन अखाड़े के नागा संन्यासी हैं, लेकिन वह नागा 12 साल की उम्र में नहीं बने। उस वक्त वह संन्यासी बने। जब 18 साल की उम्र पूरी हुई, तब नागा बनने से जुड़ा धार्मिक कार्यक्रम करना पड़ा। जब कोई संत नागा बनता है तब उसे सबसे पहले अपने परिवार के लोगों का श्राद्ध करना होता है, फिर अपना श्राद्ध। इसके बाद तपस्या शुरू होती है। इसके बाद एक गुरु विशेष अंग की नस खींच देते हैं। यहीं से संत नागा संन्यासी हो जाते हैं। सिर पर 45 किलो रुद्राक्ष लेकर और 6 साल चलेंगे
गीतानंद अपने सिर पर रुद्राक्ष धारण करके चलते हैं। हमने पूछा कि यह कितने हैं और इनका वजन कितना होगा? वह इसके पीछे की कहानी बताते हैं। कहते हैं- सवा लाख रुद्राक्ष धारण करने का संकल्प था। हमारे जो भक्त हैं वह देते गए। अब ये सवा दो लाख रुद्राक्ष हो गए हैं। इनका वजन 45 किलो हो गया है। हर दिन 12 घंटे इसे सिर पर रखते हैं। सुबह 5 बजे स्नान करने के बाद इस मुकुट को पूरे विधि-विधान से सिर पर रख लिया जाता है। शाम को 5 बजे मंत्रोच्चारण के साथ इसे नीचे रखा जाता है। गीतानंद ने इस हठयोग तपस्या को प्रयागराज में 2019 के अर्धकुंभ में शुरू किया था। 12 साल की तपस्या है, जिसके 6 साल पूरे हो गए हैं। अगले 6 साल तक वह ऐसे ही सिर पर 45 किलो रुद्राक्ष रखे रहेंगे। हमने पूछा कि क्या इसके बाद भी कोई तपस्या करने की सोच रखी है? वह कहते हैं- यह मेरी आखिरी तपस्या है। सब प्रभु की कृपा से होता है। इसके बाद गीतानंद गिरि अपनी पुरानी तपस्याओं के बारे में बताते हैं। हमने उनसे मौजूदा कुंभ को लेकर बात की। वह कहते हैं- इस साल व्यवस्थाओं में बहुत बदलाव दिख रहा है। इस बार जो टेंट लगे हैं, उनकी क्वालिटी बढ़िया है। पहले के कुंभ में इस तरह की व्यवस्था नहीं होती थी। इस साल राशन-पानी को लेकर भी बात कही गई है। हालांकि अभी मिला नहीं है, लेकिन संभावना है कि मिलेगा। क्या हिंदू धर्म खतरे में है
गीतानंद गिरि से हमने पूछा कि तमाम लोग कहते हैं कि सनातन धर्म खतरे में है? इसके जवाब में वह कहते हैं- ऐसी कोई बात नहीं है। पहले तो यह देखना होगा कि कहता कौन है? कहने वाले तो ज्यादातर नेता हैं। उन्हें अपनी राजनीति चमकानी है। राजनीतिक रोटियां सेंकनी हैं इसलिए इस तरह की बात करते हैं। आज सनातन और हिंदू धर्म दुनिया के हर हिस्से में पहुंच गया है। —————– ये खबर भी पढ़ें… 45 दिन की ट्रेनिंग के बाद बनते हैं ‘अघोरी’, हर अखाड़े में इनकी डिमांड, 1 हजार दिन की कमाई; काली बनते हैं ‘प्रयागराज महाकुंभ में हमें 8 पेशवाई का ऑर्डर मिला है। 45 दिन पहले ही अखाड़े की तरफ से हमें बता दिया जाता है कि क्या-क्या चाहिए। हम झांकी के लिए उसी हिसाब से अपने लड़के तैयार करते हैं। हनुमान मैं खुद बनता हूं। अघोरी, श्रीकृष्ण, भोले नाथ, काली चुनते हैं। फिर उन्हें सिखाते हैं। जब सब परफेक्ट हो जाते हैं तो हम लोग ड्रामा करते हैं।’ ये कहना है गोलू का। वह ‘दीपक-गोलू झांकी’ ग्रुप चलाते हैं। कुंभ में जो पेशवाई निकल रही है, उसमें उनकी टीम अलग-अलग थीम पर झांकी निकालती है। पढ़ें पूरी खबर…


