नेता, प्रशासन, पुलिस पर कोई आरोप नहीं क्योंकि….:झीरम पर NIA जांच मौके पर 1.5 किमी में सिमटी रही, षड्यंत्र के एंगल पर नहीं…

छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े नक्सली हमले का मामला केंद्रीय मंत्री जेपी नड्‌डा के बयान के बाद फिर सुर्खियों में है। इससे नई बहस छिड़ गई है कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं समेत 29 लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार कौन है। क्या सिर्फ एक नक्सली हमला था या फिर कोई राजनीतिक साजिश? घटना के 12 साल बाद भी यह सवाल जस का तस है। घटना दिनांक, 25 मई 2013 के 2 दिन बाद एनआईए ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी थी। भास्कर पड़ताल में खुलासा हुआ कि जांच महज 1.5 किमी के घटना स्थल (घाटी क्षेत्र), व परिस्थितिजनक साक्ष्यों तक सीमित रही। फोकस में नक्सल एंगल रहा, षड्यंत्र नहीं। यही वजह है कि धारा 120-बी लगने के बावजूद जांच की आंच नेता, शासन, प्रशासन, पुलिस तक पहुंची ही नहीं। हालांकि सवाल कई बार उठते रहे हैं। हमले की जांच के लिए पहले पुलिस, फिर एसआईटी इसके बाद एनआईए, फिर न्यायायिक जांच आयोग बना। न्यायिक जांच आयोग ने तो चार साल पहले 4000 पन्नों से ज्यादा की रिपोर्ट तत्कालीन राज्यपाल अनुसुईया उइके को सौंपी थी। लेकिन रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई। इसके बाद न्यायिक जांच आयोग का कार्यकाल बढ़ाते हुए दो जजों की नई कमेटी बना दी गई। लेकिन इसकी जांच अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। यही वजह है कि इस मामले को लेकर प्रदेश की राजनीति लगातार गरमाती रही है। अब तक कौन-कौन सी जांच हुई बिलासपुर के कांग्रेस नेता विवेक वाजपेयी झीरम हमले के चश्मदीद रहे। वे काफिले में साथ थे। उनकी इनोवा में कई गोलियां लगी थीं। उन्होंने ये गाड़ी संभालकर रखी है। 1. प्रारंभिक जांच छत्तीसगढ़ पुलिस
कब: 2013 किसने: बस्तर रेंज पुलिस/राज्य पुलिस ने मौके की जांच की, एफआईआर दर्ज, नक्सली संगठन की भूमिका, प्रत्यक्ष हमलावरों की पहचान, हथियार, विस्फोटक और मूवमेंट की जानकारी, यह शुरुआती जांच बाद में केंद्र को सौंपी गई। 2. एनआईए जांच: 2014 से
जांच का दायरा: हमले की साजिश, नक्सली कमांडरों की भूमिका, किसने साजिश रची, किस रास्ते से घात लगाया।
मुख्य बिंदु: नक्सलियों नेतृत्व को आरोपी बनाया, कई नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए, कुछ पर चार्जशीट पेश, जांच खत्म नहीं। 3. एसआईटी गठित: 2019 में इसके तहत पुलिस ने ‘बड़ी साजिश’ की अलग जांच
किसने: छत्तीसगढ़ पुलिस
क्या देखा गया: क्या हमले से पहले जानकारी लीक हुई? सुरक्षा व्यवस्था में जानबूझकर चूक? स्थानीय नेटवर्क / सहयोगी, राजनीतिक, प्रशासनिक लापरवाही। 4. न्यायिक जांच आयोग : 2013 में
कब: राज्य सरकार द्वारा गठन उद्देश्य: प्रशासनिक- सुरक्षा चूक की जांच, सुरक्षा क्यों नाकाम रही
किस स्तर पर गलती हुई, काम: गवाहों के बयान, अफसरों से पूछताछ, दस्तावेजों की जांच। 5. न्यायिक जांच आयोग का पुर्नगठन: 2021 में
दो जजों की समिति बनी, इसका गठन इसलिए किया गया क्योंकि जांच आयोग द्वारा राज्यपाल को सौंपी गई रिपोर्ट में कमियां थीं। इसलिए पुनर्गठन किया गया। इसे 2013 में बनी मूल न्यायिक जांच रिपोर्ट, एनआईए और पुलिस की अपराधिक जांच के साथ पीड़ितों, गवाहों के बयानों की समीक्षा, षड़यंत्र की जांच भी करने के लिए गठित की गई। मेरे द्वारा अभियोजन संचालन बीते 3 सालों से किया जा रहा है -दिनेश पाणिगृही, वकील, एनआईए तीन सवालों का जवाब जांच में नहीं मिला
पहला- घाटी में जिस ट्रक की वजह से कांग्रेस का काफिला रुका, वह किसका है? कौन लाया? ड्राइवर कौन? दूसरा- झीरम घाटी को सर्वाधिक नक्सल प्रभावित माना गया तो काफिले को इस ओर क्यों ले जाया गया? पुलिस ने क्यों नहीं रोका? तीसरा- एनआईए ने मृतकों के परिजन के बयान नहीं लिए? अलग-अलग जांचों के बाद भी अब तक झीरम हमले के प्रमाणिक तथ्य सामने क्यों नहीं आए? टोटल रीकॉल: क्या हुआ था उस दिन
25 मई 2013 में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा में रैली थी। इसमें नंद कुमार पटेल, अजीत जोगी, विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा एवं मैं तथा अन्य कांग्रेसी कार्यकर्ता शामिल हुए। झीरम घाटी से गुजरते समय गोलीबारी होने लगी। इसमें पटेल, महेंद्र कर्मा, शुक्ल, दिनेश पटेल, उदय मुदलियार, भागीरथी पालिया, राजकुमार, गोपीचंद माधवानी, अल्लानूर, योगेंद्र शर्मा, राजेश चंद्राकर, मनोज जोशी, अभिषेक गोलचा, गनपथ नाग, सदा सिंह, चंद्रहास ध्रुव, दीपक उपाध्याय, तरूण देशमुख, प्रहलाद, चंदर राम मांझी, पैतृक खालखों, पवन कोंद्रा, सियाराम सिंह मारे गए।

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