लंबी बीमारी के बाद एम्स में निधन:चुप्पी को भाषा देकर शांत हुए विनोद शुक्ल… फिर भी उनका होना बचा रहेगा

हिंदी साहित्य का एक सूरज अस्त हो गया। शब्दों की दुनिया में चुप्पी की एक गहरी जगह बनाते हुए वरिष्ठ कवि-कथाकार विनोद कुमार शुक्ल अब हमारे बीच नहीं रहे। मंगलवार को एम्स रायपुर में उन्होंने अंतिम सांस ली। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे शुक्ल का इलाज यहीं चल रहा था। महज एक महीने पहले, 21 नवंबर को उन्हें हिंदी साहित्य के सर्वोच्च सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से नवाजा गया था। और अब वही हाथ, जो शब्दों को सहलाते थे, स्थिर हो गए। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे विनोद कुमार शुक्ल हिंदी साहित्य में उस दुर्लभ आवाज के लेखक थे, जो बिना शोर किए बहुत दूर तक सुनाई देते रहे। 1971 में प्रकाशित पहला कविता संग्रह ‘लगभग जय हिन्द’ से शुरू हुआ उनका साहित्यिक सफर कविता को नई विनम्रता, नई संवेदना और नई दृष्टि देता चला गया। ‘वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहिनकर विचार की तरह’, ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’, ‘कविता से लंबी कविता’, ‘आकाश धरती को खटखटाता है’ जैसी कृतियां हिंदी कविता की दिशा बदलने वाली मील का पत्थर बनीं। गद्य में भी उनकी उपस्थिति उतनी ही प्रभावशाली रही। 1979 में आया उपन्यास ‘नौकर की कमीज’, जिस पर मणि कौल ने फिल्म बनाई, हिंदी उपन्यास की भाषा और दृष्टि को नई जमीन देता है। इसके बाद ‘खिलेगा तो देखेंगे’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, ‘एक चुप्पी जगह’ जैसे उपन्यासों और ‘पेड़ पर कमरा’, ‘महाविद्यालय’, ‘घोड़ा और अन्य कहानियां’ जैसे कहानी संग्रहों ने उन्हें साहित्य का अनिवार्य नाम बना दिया। उनकी रचनाएं कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनूदित हुईं, पर मूल में हमेशा वही सादगी और गहराई बनी रही। सम्मानों की लंबी सूची उनके कद की गवाही देती है। साहित्य अकादमी पुरस्कार, मुक्तिबोध फेलोशिप, रजा पुरस्कार, पैन-नाबोकोव पुरस्कार (2023) और अंततः ज्ञानपीठ। लेकिन शुक्ल कभी पुरस्कारों से परिभाषित नहीं हुए। वे पाठक की चुप सहमति और संवेदना से पहचाने जाते रहे। विनोद कुमार शुक्ल का जाना सिर्फ एक लेखक का जाना नहीं है। यह उस भाषा का मौन है, जो बहुत धीरे बोलती थी, लेकिन भीतर तक उतर जाती थी। साहित्य आज थोड़ा और अकेला हो गया है… और पाठक, थोड़ा और ऋणी। छत्तीसगढ़ दौरे पर आए पीएम मोदी ने पूछा था हाल-चाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में हॉस्पिटल में भर्ती विनोद कुमार शुक्ल से फोन पर बात कर उनका हाल-चाल जाना था। मोदी छत्तीसगढ़ के 25वें स्थापना दिवस पर रायपुर आए थे। इस दौरान विनोद कुमार शुक्ल ने प्रधानमंत्री से कहा था कि ‘लिखना मेरे लिए सांस लेने जैसा है। मैं जल्द से जल्द घर लौटना चाहता हूं – मैं लिखना जारी रखना चाहता हूं।’ अंत्येष्टि आज: विनोद शुक्ल का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ रायपुर के मारवाड़ी श्मशान घाट में किया जाएगा। शैलेंद्र नगर रायपुर स्थित निवास से सुबह 10:30 बजे अंतिम यात्रा निकलेगी। विनोद कहते थे- रात में नींद नहीं आती तो मुक्तिबोध की तस्वीर के पास बैठ जाता हूं विनोद कुमार शुक्ल के चले जाने के बावजूद उनका समूचा साहित्य, हिंदी साहित्य के लिए ही नहीं विश्व साहित्य के लिए भी एक अतुलनीय उदाहरण की तरह देखा जाएगा। यानी सब कुछ होना बचा रहेगा। मैं क्या हूं, ताकत भी क्या है, इकट्ठी ताकत तो एक-एक कमजोर का विचार है… पर जीवन पर्यंत विश्वास करने वाले विनोद कुमार शुक्ल कई अर्थों में हिंदी के विलक्षण रचनाकार थे। मैं दुनिया के सारे सन्नाटे को सुनता हूं। रात में जब नींद नहीं आती है तो मैं मुक्तिबोध की तस्वीर के निकट जाकर बैठ जाता हूं और उन्हें अपने निकट पाता हूं… कहने वाले विनोद जीवन और लेखन में मुक्तिबोध के सान्निध्य में बिताए हुए दिनों को याद कर इन दिनों बेहद भावुक हो उठते थे। विनोद को गढ़ने में जिन पांच विराट चरित्रों की सर्वाधिक उल्लेखनीय भूमिका रही है। उनमें उनकी मां रुक्मिणी देवी, चाचा किशोरी लाल शुक्ल, जिन्होंने पिता की असमय मृत्यु के बाद परिवार को आश्रय दिया, विनोद की धर्मपत्नी सुधा, हरिशंकर परसाई तथा मुक्तिबोध प्रमुख हैं। जबलपुर में कृषि महाविद्यालय में अध्ययन के दौरान विनोद को हरिशंकर परसाई का सान्निध्य मिला। शुक्ल अक्सर परसाई जी के नेपियर टाउन स्थित घर जाया करते थे। राजनांदगांव के दिग्विजय महाविद्यालय में मुक्तिबोध की नियुक्ति के पश्चात अपने बड़े भाई संतोष शुक्ल, जो मुक्तिबोध के छात्र थे, उनके साथ मुक्तिबोध के बसंतपुर निवास में जाकर पहले पहल मिलना विनोद जी को आज भी रोमांचित करता था। वे उस पल को याद करते हुए बताते थे कि किस तरह शाम की गहरे धुंधलके में मुक्तिबोध अपने हाथों में कंदील लेकर बाहर निकले थे, जिसकी रोशनी पहले आई थी, रोशनी के पीछे-पीछे मुक्तिबोध आए थे, किसी कविता की अपूर्व बिम्ब की तरह। अपने लेखन को लेकर विनोद का यह कथन किसी भी बड़े कवि या लेखक के कथन की तरह है। हाल ही में रायपुर के शैलेंद्र नगर स्थित अपने घर में उन्होंने कहा था कि ‘आप जो लिख रहे हैं, वह अपने लिए नहीं लिख रहे हैं। जो भी लिख रहे हैं वह सब ओर बिखर जाएगा और सब तक पहुंच जाएगा। मेरा लिखा हुआ अगर बिखर कर सब तक नहीं पहुंचा तो एक पेड़ की तरह हो जाएगा, जिससे लोग मेरी छाया में सुस्ता सकें।’ विनोद जी जब बच्चों के लिए लिख रहे थे तब उनकी मुस्कान भी वैसी बालसुलभ थी आखिर उनकी सांसों ने साथ छोड़ दिया। श्वास का संताप तो अब पूरा हुआ, सर्दी में। पर गर्मियां कौन-सी अच्छी गुजरी थीं। कभी चलना-फिरना बाधित हुआ। कभी स्वास्थ्य ने सताया तो कभी साहित्य के ‘ठेकेदारों’ ने। भला हो उनका, जिन्होंने सिद्ध किया कि प्रकाशक के पास की दीवार में भी खिड़की होती है। ज्ञानपीठ अनुगामी बना। विनोद जी बेहद सरल इंसान थे। रायपुर में जब हम उनके घर पहुंचे तो बीमार होने के बावजूद वे आह्लाद से मिले। मैंने कहा ‘सन् 1970 या 75 में मैंने आपकी किताब ‘लगभग जय हिन्द’ पढ़ी थी, अब तक उसके प्रभाव में हूं।’ नौकर की कमीज भी याद है। उन्होंने हंसकर कहा, ‘मैं तो आपको पढ़ता हूं।’ मैं झेंप गई। यह होता है महान लेखक का बड़प्पन। ‘आजकल क्या लिख रहे हैं?’ मैंने पूछा तो कहा, ‘बच्चों के लिए कुछ…’ तब उनके चेहरे पर भी बच्चों जैसी मुस्कान थी। विनोद जी याद आते रहेंगे अपने अनोखे लेखन, शब्द-प्रयोग, सहज काव्य सृजन और संवेदनशील नजर के लिए। शुक्ल का योगदान याद रहेगा: पीएम
पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा, विनोद कुमार शुक्ल के निधन से दुख हुआ है। हिन्दी साहित्य जगत में अमूल्य योगदान के लिए वे हमेशा स्मरणीय रहेंगे। मेरी संवेदनाएं उनके परिजन के साथ हैं। हमेशा गौरव रहेंगे शुक्ल: सीएम
सीएम विष्णुदेव साय ने कहा है कि विनोद जी का निधन बड़ी क्षति है। वे छत्तीसगढ़ के गौरव के रूप में हमेशा हम सबके हृदय में विद्यमान रहेंगे।

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