मुर्गा लड़ाई में लग रही 1 लाख तक की बोली‎:मुर्गे को खिलाते हैं देसी अंडे, किशमिश; 18 माह की ट्रेनिंग के बाद होते हैं तैयार‎

मकर संक्राति के मौके पर झारखंड के कई क्षेत्रों में मुर्गा लड़ाई का ‎खेल शुरू हो गया है। इसे देखने के लिए‎ लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है। जमशेदपुर में सोनारी ‎मरीन ड्राइव स्थित दोमुहानी समेत कई ‎स्थानों पर मुर्गा लड़ाई का खेल चल रहा‎ है। यहां आंध्रा मुर्गा का क्रेज सबसे अधिक देखा गया। ‎इस मुर्गे पर लोगों ने 50 हजार रुपए से एक ‎लाख रुपए तक की बोली लगा रहे हैं। लड़ाकू मुर्गे को तैयार करने के लिए उनके मालिक उन्हें देसी अंडे,‎ किशमिश, अनार और खजूर‎ खिलाते हैं। करीब 18 माह की ट्रेनिंग के बाद ये लड़ने लायक बन जाते हैं। मुर्गों के‎ पैरों में धारदार ब्लेड (काती) बांध कर उन्हें एक-दूसरे‎ से लड़ाया जाता है। जीतने वाले को इनाम के ‎साथ-साथ हारा हुआ मुर्गा भी दिया जाता है। दोनों मुर्गों पर लगा रहे दांव
मुर्गा लड़ाई शुरू होने से पहले लोग आपस में लड़ने वाले दोनों मुर्गों पर दांव लगाते हैं। कुछ देर तक दोनों मुर्गों‎ की लड़ाई बराबरी पर होती है। मुर्गों पर दाव लगातार बढ़ता चला जाता। धीरे-धीरे मुर्गों के बीच लड़ाई तेज हो जाती है। इसके बाद एक मुर्गा जीत जाता है। नियम है कि पैसे के साथ-साथ जीतने वाले ‎मुर्गे के मालिक को हारा हुआ मुर्गा भी दिया जाता है। हारे हुए मुर्गे को कुछ लोग अपने साथ घर ले जाते हैं तो कई लोग उसे मौके पर ही बेच देते हैं।‎ इधर, दाव लगाने वाले लोग हार-जीत के अनुसार आपस में पैसे बांट लेते हैं। पैर की मजबूती के लिए मुर्गे ‎को पानी में तैराते हैं‎
चांडिल के चिलगु निवासी दुखू बाघ‎ आंध्रा मुर्गा लेकर और दोमुहानी का ‎सुजीत पाल देसी मुर्गा लेकर लड़ाने‎ मेले में पहुंचे थे। दुखू बाघ ने ‎बताया कि मुर्गे को लड़ाने के लिए‎ पहले ट्रेनिंग दी जाती है। उन्हें पानी ‎में तैरने के लिए छोड़ दिया जाता है। ‎इससे मुर्गे का पैर मजबूत होता है। ‎लगातार तैरने से उनका स्टेमिना भी‎ बढ़ता है। मुर्गे को 16 से 18 महीने ‎तक लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती है।‎ इसके अलावा मुर्गे को, देसी अंडे,‎ किशमिश, अनार और खजूर‎ खिलाते हैं। तब जाकर मुर्गे लड़ाई के‎ लिए तैयार होते हैं। मुर्गों को कई तरह‎ की दवाएं भी दी जाती है।‎ 500 से 3000 में बिक रहा काती
मुर्गा लड़ाई में मुर्गें के पैर में बंधने वाले धारदार ब्लेड (काती) के नाम पर भी मेले में अवैध धंधा चल रहा है। आम दिनों में बाजार में 20 से 50 रुपए में मिलने वाले काती की कीमत मेले में 500 से 3 हजार रुपए तक पहुंच जा रही है। मुर्गों को जल्द चित करने के लिए काती में कई तरह के कैमिकल मिलाए जा रहे हैं।

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