रामगढ़ में सीमेंट फैक्ट्री और खनन के खिलाफ आंदोलन:ग्रामीणों ने कहा- “विकास नहीं, यह तो विनाश की साजिश है, आंदोलन की चेतावनी दी

सीमावर्ती जिले के रामगढ़ गांव में डालमिया भारत फाउंडेशन द्वारा प्रस्तावित सीमेंट फैक्ट्री और लाइमस्टोन (चूना पत्थर) खनन परियोजना ने एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले लिया है। शुक्रवार को ग्राम पंचायत प्रशासन के नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामीणों ने हुंकार भरते हुए स्पष्ट कर दिया कि वे अपनी सात पीढ़ियों की ज़मीन और अस्तित्व को किसी कॉर्पोरेट के हाथों नीलाम नहीं होने देंगे। ग्रामीणों ने ADM को सौंपे ज्ञापन में इस पूरी परियोजना को ‘विकास का मुखौटा पहने विनाश का मॉडल’ करार दिया है। उन्होंने इसे तुरंत निरस्त करवाने की मांग की अन्यथा उग्र आंदोलन की चेतावनी दी। सात पीढ़ियों की बसावट और गोचर पर ‘कब्जे’ की तैयारी
ग्रामीणों का सबसे बड़ा विरोध ज़मीन के अधिग्रहण को लेकर है। ज्ञापन में बताया गया कि जिस क्षेत्र को खनन के लिए चिह्नित किया गया है, वहां ग्रामीणों की सात पीढ़ियों से आबादी बसी हुई है। इसमें पुरखों के घर, पशुओं के लिए आरक्षित गोचर भूमि जैसे संवेदनशील इलाके शामिल हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि यह फैक्ट्री लगती है, तो हज़ारों लोग बेघर हो जाएंगे और उनके आराध्य देवस्थान व पुरखों की समाधियां मलबे में तब्दील हो जाएंगी। मरुस्थल में ‘जल और सांस’ पर संकट
रेगिस्तानी इलाका होने के कारण यहां पानी की बूंद-बूंद कीमती है। ग्रामीणों ने तकनीकी और पर्यावरणीय आधार पर फैक्ट्री का विरोध करते हुए कहा- सीमेंट फैक्ट्री में लाखों लीटर भूजल का दोहन होगा, जिससे क्षेत्र के कुएं, ट्यूबवेल और पारंपरिक पेयजल स्रोत पूरी तरह सूख जाएंगे। फैक्ट्री से निकलने वाली ‘सीमेंट डस्ट’ जब खेतों की मिट्टी और फसलों पर जमेगी, तो पूरी उपजाऊ भूमि बंजर हो जाएगी। इसके साथ ही चूना पत्थर के खनन और सीमेंट उत्पादन से उड़ने वाली धूल सिलिकोसिस, दमा, अस्थमा और कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का कारण बनेगी। ग्रामीणों का सवाल है— “क्या हम अपने बच्चों को जन्म के साथ ही मौत के मुहाने पर धकेल दें?” “बिना सहमति के कैसे शुरू हुई प्रक्रिया?”
आंदोलनकारियों ने प्रशासन की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। ग्राम पंचायत प्रशासक पुष्पा भार्गव ने बताया कि 23 दिसंबर को हुई जनसुनवाई में ग्रामीणों ने एक सुर में विरोध दर्ज कराया था, फिर भी नीलामी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या है। ग्रामीणों का आरोप है कि ग्राम सभा की वास्तविक सहमति के बिना कागजों में हेरफेर कर इस परियोजना को थोपा जा रहा है। प्रशासन को दो-टूक चेतावनी: गांव झुकेगा नहीं
ज्ञापन के माध्यम से ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) की स्वतंत्र जांच करवाई जाए और फैक्ट्री की अनुमति तुरंत रद्द की जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि किसान की जिंदगी कंपनी के मुनाफे से सस्ती नहीं है। यदि उनकी मांगों पर गौर नहीं किया गया, तो यह विरोध प्रदर्शन गांव की सीमाओं से निकलकर प्रदेश स्तर के आंदोलन में बदल जाएगा। आक्रोश के मुख्य बिंदु: ऐतिहासिक जल स्रोत: ‘खड़ीन’ और प्राचीन तालाबों को संरक्षित क्षेत्र घोषित करने की मांग। पशुधन पर खतरा: भारी विस्फोटों से पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ेगा और गोचर खत्म होने से मवेशी मर जाएंगे। अधिकारों की लड़ाई: ग्रामीणों ने नारा दिया है— “गांव की ज़मीन, गांव का हक; कॉर्पोरेट की जागीर नहीं।” इस विरोध प्रदर्शन में रामगढ़ के किसान, मज़दूर, युवा बड़ी संख्या में शामिल हुए। अब देखना यह है कि प्रशासन विकास के दावों और जन-भावनाओं के बीच क्या रुख अपनाता है।

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