आरयूएचएस प्रदेश का एक मात्र अस्पताल है, जिसमें तीन मुख्य पदों पर बैठे अधिकारी पिछले कई सालों से कार्यवाहक की भूमिका में ही काम कर रहे हैं। सरकार और चिकित्सा विभाग के आला अधिकारियों की लेटलतीफी की वजह से ही आरयूएचएस में स्थायी नियुक्ति नहीं हो सकी हैं। हालांकि सरकार हर बार कुछ दिन में पद भरने का आश्वासन देती है, लेकिन पिछले 6 महीने में कुछ नहीं कर सकी है। अब इस वजह से एम्स की तर्ज पर चलाए जाने वाले रिम्स (राजस्थान इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) का भी काम प्रभावित हो रहा है। एसएमएस अस्पताल में मरीजों के भार को कम करने के लिए पिछले कई सालों से कवायद चल रही है। इसी क्रम में आरयूएचएस में रिम्स को तैयार किया जा रहा है। उद्देश्य है कि एम्स की तरह ही रिम्स में इलाज प्रक्रिया शुरू हो और मरीजों को यहां बेहतर इलाज दिया जा सके। लेकिन आरयूएचएस में पिछले 8 महीने से यहां कुलपति, प्रिंसीपल और अधीक्षक कार्यवाहक के तौर पर ही लगे हैं और वे भी स्थायी होने का इंतजार कर रहे हैं। कार्यवाहक कुलपति डॉ. धनंजय अग्रवाल, कार्यवाहक प्रिंसीपल डॉ. विनोद जोशी और कार्यवाहक अधीक्षक डॉ. महेन्द्र बैनाड़ा बने हुए हैं। हालांकि ये सभी आश्वस्त हैं कि सरकार इन्हें ही स्थायी करेगी, लेकिन विभाग के अधिकारियों की मानें तो इनमें से दो पदों को बदला जाना लगभग तय है और उसी के लिए सही डॉक्टर की तलाश की जा रही है। परेशानी यह कि सरकार को योग्य उम्मीदवार नहीं मिल रहा है और वे मामले को लटकाए हुए हैं। ऐसे में अस्पताल का काम भी प्रभावित हो रहा है। हालांकि आरयूएचएस कुलपति के चयन के लिए राजभवन की ओर से सर्च कमेटी गठित हो चुकी है और माना जा रहा है कि अगले कुछ ही दिनों में इस पद को स्थायी कर दिया जाएगा। फिलहाल यह आ रही परेशानी महत्वपूर्ण फैसले लिए जाने में देरी हो रही है। बड़े डिसीजन के लिए सरकार पर निर्भरता। मशीनरी खरीदने से लेकर कोई भी टेंडर करने में झिझक और अन्य अस्पतालों की ओर रूख करना पड़ता है। कर्मचारियों, डॉक्टर्स और स्टाफ से कराने में परेशानी। दबाव के साथ काम कराने में नाकाम रहते हैं। कर्मचारी भी मानते हैं कि कोई स्थायी अधिकारी आएगा तो फिर उसके अनुसार करना होगा। न केवल आरयूएचएस बल्कि एसएमएस से सम्बद्ध अस्पतालों के अधीक्षक भी सरकार तय नहीं कर पाई है। दो बार आवेदन लेने के बाद भी स्टेट कैंसर, गणगौरी, जयपुरिया, सहित अन्य अस्पतालों के अधीक्षक तय नहीं कर पाई है।


