नशेड़ी पकड़े, कोर्ट में पेश किए… और वहां से घर भेज दिए; वे फिर से नशा करने लग गए

नशेड़ियों को पकड़कर उनकी आदत छुड़वाकर इनकी संख्या घटाने के दावे किए जाते रहे हैं। पर हो कुछ और रहा है। अधिकतर मामलों में इसे ऐसे समझिए, पुलिस ने नशा करने वालों को पकड़ा (तस्कर को नहीं), रातभर थाने में रखा, अगले दिन कोर्ट में पेश किया, वहां से एडिक्शन सेंटर गए, जहां उनका कार्ड बनता है। एक बार दवाई ली। बेड की संख्या कम होने के कारण दवाई देकर घर भेज दिए गए। इसके बाद उसने दवाई खाई या नहीं ये देखने वाला कोई नहीं। अगली बार दवाई लेने जाते हैं या नहीं, इसकी भी ट्रैकिंग का कोई हिसाब नहीं। कई बार जो दवाई मिलती है उसे बेचकर नशेड़ी फिर से नशा करने लगते हैं। नतीजा… इस पूरी प्रक्रिया के बाद ये लोग पहले की तरह फिर से नशे में जुट जाते हैं। इस पूरी कवायद का फायदा… शून्य…। 1 जनवरी 2025 से 23 दिसंबर 2025 के बीच लुधियाना पुलिस ने शहर के 24 थानों समेत पूरे जिले में एनडीपीएस एक्ट के तहत 1177 से ज्यादा एफआईआर दर्ज की हैं। इसमें कुल 1530 को पकड़ा गया। कागजों में यह कार्रवाई नशे के खिलाफ बड़ी सफलता दिखती है, लेकिन जब भास्कर ने इस मामले से जुड़ी 300 से ज्यादा एफआईआर को ध्यान से देखा तो तस्वीर बिल्कुल अलग नजर आई। जिन लोगों पर केस दर्ज किए गए, वे बड़े नशा तस्कर नहीं बल्कि नशा करने वाले आम लोग हैं। अधिकांश एफआईआर में लगभग एक जैसी भाषा का इस्तेमाल किया गया है। पुलिस का दावा है कि पकड़े गए लोगो को नशा छुड़ाने के लिए डि–एडिक्शन सेंटर भेजा गया। भास्कर की जांच में कुछ ऐसे केस भी सामने आए, जिनमें पुलिस ने रिकवरी के नाम पर सिर्फ 10 रुपए का नोट, सिल्वर पन्नी और एक लाइटर बरामद दिखाया है। इतनी मामूली रिकवरी के आधार पर एनडीपीएस के तहत एफआईआर से नशे के नेटवर्क नहीं टूट पाया है। नवंबर तक करीब 100 नशा करने वालों को ही भर्ती किया गया है। अधूरे साधन, मुहिम फेल हो रही पुलिस ने तो एफआईआर दर्ज करके अपना काम कर दिया है। इसके बाद नशा छुड़ओं केंद्रों में बैड या उनकी संख्या को बढ़ाने का काम सरकार का है। इसके अलावा एनजीओ और नशा करने वाले के पारिवारिक सदस्यों को भी इस मुहिम में शामिल करके रखना चाहिए। इसके बाद ही नशा करने वालों की की सही से काउंसलिंग हो सकती है। वहीं, री-चैकिंग का प्रबंध भी होना चाए क्या वाकई में नशा करने वाला व्यक्ति सुधर चुका है या फिर दोबारा से गलत कामों में पड़ गया है। किसी भी सिस्टम को लागू करने से पहले उसके साधन पूरे तैयार रखने चाहिए, अधूरे साधनों से कोई भी मुहिम कामयाब नहीं हो पाती है। नशा छुड़ाओ केंद्र और बेड कम {एफआईआर के बाद नशा छुड़ाओ केंद्र नहीं भेजा? -रिहैबिलिटेशन सेंटर, बैड स्पेस की कमी है। {हमारी जानकारी के मुताबिक, जिन लोगों पर मामला दर्ज हुआ, वो मेडिसिन नहीं लेते, वापस पहले जैसा नशा कर रहे हैं? -हमने तो उन्हें सेंटर से कार्ड बनवा कर दे दिया है। अब वो खुद नशा छोड़ना नहीं चाहते हैं तो इसमें पुलिस क्या कर सकती है। लेकिन हमने प्रयास करके काफी हद तक नशे की सप्लाई तोड़ दी है। {क्या इसका मतलब पुलिस ने सिर्फ संख्या बढ़ाने के लिए एनडीपीएस एक्ट के तहत नशेड़ियों पर पर्चे दर्ज किए हैं ? – ऐसा नहीं है, पुलिस ने अपना काम किया है। इससे नशे की सप्लाई टूटी है। महिलाओं को सिर्फ ओपीडी तक ही सीमित रखा पुलिस ने अब तक 600 से ज्यादा लोगों पर, जिनमें 10 महिलाएं भी शामिल हैं, पर्चा दर्ज कर नशामुक्ति केंद्र भेजा का दावा किया है। महिलाओं को नशा छुड़ाओं केंद्र में एक दिन भी लाया नहीं, क्योंकि सेंटर में महिलाओं को रखने की सुविधा ही नहीं है। उनका इलाज ओपीडी में ही किया। अप्रैल से अब तक 600 से ज्यादा नशा छुड़ाओ केंद्रों में कार्ड बने हैं और कागजों में लोगों को लुधियाना, समराला और जगराओं में इस कैंपेन के तहत दाखिल हुआ बताया गया। जबकि तीनों सेंटर्स पर सिर्फ 10-10 बेड ही हैं। सरकारी बेड के भरने पर प्राइवेट हॉस्पिटल्स में भेजा जाता है, जहां भी एक व्यक्ति को नशा छुड़वाने के लिए 5 दिन रखा जाता है। बाद उन्हें रिहेबिलिटेशन के लिए जगराओं में भेजा जाता है, लेकिन वो भी कागजों में क्योंकि जगराओं में सिर्फ 60 बेड हैं। एक ही जैसे आरोप… ‘~10 का नोट+ लाइटर+ सिल्वर पन्नी’ अवनेश मंगलम, पूर्व डीजीपी सीधी बात स्वपन शर्मा, पुलिस कमिश्नर, लुधियाना केस-1 कार्ड बनवाकर घर भेज दिया: थाना डिवीजन नंबर-6 ने अक्तूबर में गौशाला चौक के पास रहने वाले एक युवक को रेलवे लाइनों के पास नशा करते पकड़ा गया और उससे रिकवरी के तौर पर 10 का नोट, सिल्वर पन्नी और एक लाइटर बताया गया। पुलिस ने एफआईआर के अगले दिन उसे अदालत में पेश किया और नशा छुड़ओ केंद्र से कार्ड बनवाकर उसे घर भेज दिया, जो आज भी पहले की तरह जिंदगी कट रही है। केस-2 दवाई लेने ही नहीं जाता: पुलिस ने माधोपुरी में रहने वाले युवक को रेलवे लाइन के पास नशा करने के आरोप में पकड़ा। उससे भी रिकवरी के तौर पर 10 रुपए का नोट, लाइटर, सिल्वर पन्नी की। अदालत में पेश किया और उसके बाद नशा छुड़ाओ केंद्र से कार्ड बनवाकर घर भेज दिया गया, उसे ये कहा गया कि रोजाना केंद्र से गोलियां लेकर जाए। उसने बताया कि वो वहां जाता नहीं है। केस-3 ऐसा कोई युवक वहां रहता ही नहीं: थाना हैबोवाल की पुलिस ने सितंबर आखिरी में एक एफआईआर एक युवक पर की, उससे भी रिवकरी के तौर पर 10 रुपए का नोट, सिल्वर पन्नी और एक लाइटर मिला। जिस पर एफआईआर दर्ज की है, उसका एड्रेस ही सही नहीं है। सिर्फ इलाके का नाम दर्ज है। भास्कर ने पूरे इलाके में उसकी जानकारी जुटाई। ऐसा कोई नहीं है। केस-4 आज तक नशा छुड़ओ केंद्र नहीं गया: थाना डाबा की पुलिस ने नवंबर में गगन नगर के एक युवक पर एफआईआर दर्ज की। उसकी कॉपी में शब्दावली बाकी थानों में दर्ज के अनुसार एक जैसी ही थी। युवक से रिकवरी में 10 रुपए का नोट, सिलवर पन्नी और एक लाइटर बरामद किया। युवक आज तक नशा छुड़ओ केंद्र नहीं गया। केस-5 पहले की तरह नशे में जिंदगी: गुरु गोबिंद सिंह नगर के रहने वाले एक युवक को भी पुलिस ने 10 रुपए के नोट, सिल्वर पन्नी और लाइटर के साथ पकड़ा। उसे नशा छुड़ाओ केंद्र में भर्ती तो करवाया गया, कुछ दिन में ही घर भेज दिया। आज पहले की तरह जिंदगी व्यतीत करता है। केस-6- नशा छुड़ाओ केंद्र का कार्ड बनाया, पर नशा जारी: डिवीजन नंबर-7 की पुलिस ने ईडब्ल्यूएस कॉलोनी के रहने वाले युवक को नशा करते पकड़ा। नशा छुड़ाओ केंद्र का कार्ड बनवाया। लेकिन युवक नशा छोड़ नहीं पाया है। वो दवाई लाता है, लेकिन खाता नहीं। पहले की तरह जिंदगी गुजार रहा है।

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