विलुप्त प्राय औषधीय व देशी पौधों के संरक्षण को लेकर इंदौर में शुरू हुआ मॉडल अब पौधारोपण तक सीमित नहीं रहा। यह शहरी व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली और नीति-निर्माण तक प्रभाव डालने लगा है। इसके तहत स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों और सरकारी परिसरों में आरईटी प्रजातियों का पौधारोपण किया गया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण होलकर साइंस कॉलेज में देखने को मिला, जहां पांच हजार आरईटी पौधों का डेमो प्लांटेशन विकसित किया गया। सकारात्मक परिणाम सामने आने के बाद देवी अहिल्याबाई विश्वविद्यालय-वन विभाग के बीच एमओयू साइन किया जाना है। इसके तहत छात्रों के लिए 15 घंटे का विशेष अकादमिक कोर्स विभाग तैयार करेगा, जिसमें छात्रों को बताया जाएगा कि किस तरह से खत्म हो रही प्रजातियों का संरक्षण किया जा सकता है। डीएफओ प्रदीप मिश्रा के मुताबिक फील्ड आधारित प्रशिक्षण दिया जाएगा। यूनिवर्सिटी ने कोर्स डिजाइन में तकनीकी मार्गदर्शन के लिए वन विभाग से सहयोग मांगा है। 22 दिसंबर को मिली सैद्धांतिक मंजूरी राज्य शासन द्वारा गठित एग्जीक्यूटिव समिति ने 22 दिसंबर को इस प्रस्ताव पर सैद्धांतिक सहमति दे दी है। अब इंदौर वन मंडल द्वारा 15 घंटे का विशेष पाठ्यक्रम डिजाइन कर डीएवीवी को प्रस्तुत किया जाएगा। इसके बाद विश्वविद्यालय और इंदौर वन मंडल के बीच औपचारिक एमओयू साइन किया जाएगा। जंगलों में तेजी से घट रही प्रजातियां : इंदौर वन मंडल के जंगलों में दहीमन, बिजा, हल्दू, कुल्लू सहित 58 प्रजातियां मात्र एक प्रतिशत ही शेष रह गई हैं। विभाग ने अब तक इंदौर वन मंडल में 58 आरईटी प्रजातियों की पहचान की है, जिनमें दहीमन, बिजा, हल्दू, हर्रा, बेहड़ा, मेंदा, तिनसा, अंजन, अर्जुन, सलई, काला तेंदू और मांडू की इमली जैसी प्रजातियां शामिल हैं। माइक्रो-फॉरेस्ट विकसित कर रहे जून में होलकर साइंस कॉलेज में 5,000 आरईटी पौधे लगाए गए हैं। इसमें विद्यार्थियों ने नर्सरी प्रबंधन की तकनीक सीखते हुए पौधारोपण किया। वन समितियों, ग्राम वन समितियों और कॉलेज-स्कूलों के जरिए व्यापक स्तर पर जनभागीदारी सुनिश्चित की जा रही है। हर समिति को 2,000 से 5,000 आरईटी पौधे तैयार करने का लक्ष्य दिया है। शहर में छोटे-छोटे सरकारी भूखंडों, शैक्षणिक परिसरों और कॉलोनियों को केएमएल मैपिंग के जरिए चिह्नित कर वहां आरईटी आधारित माइक्रो-फॉरेस्ट विकसित किए जा रहे।


