नियमों के विरुद्ध पंचायत पुनर्गठन का आरोप:गुलासर को ईसरनावड़ा में शामिल करने पर ग्रामीणों का कड़ा ऐतराज

राजस्थान सरकार द्वारा हाल ही में जारी की गई संशोधित ग्राम पंचायत पुनर्गठन सूची ने नागौर जिले में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। जिले के राजस्व गांव ‘गुलासर’ को उसकी मूल पंचायत से हटाकर नई पंचायत में शामिल करने के निर्णय के खिलाफ अब ग्रामीण लामबंद हो गए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन ने पंचायत पुनर्गठन के मूलभूत नियमों को ताक पर रखकर यह फैसला लिया है, जिससे आम जनता की मुश्किलें कम होने के बजाय और बढ़ जाएंगी। ​इस संबंध में ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर और पंचायती राज विभाग के सचिव को एक औपचारिक ज्ञापन सौंपकर अपनी नाराजगी दर्ज कराई है। ज्ञापन में बताया गया है कि हालिया फेरबदल के तहत राजस्व गांव गुलासर को ग्राम पंचायत ‘बिरलोका’ से हटाकर नवगठित ग्राम पंचायत ‘ईसरनावड़ा’ में जोड़ दिया गया है। ग्रामीणों के अनुसार, यह निर्णय पंचायती राज विभाग के उन नियमों का सीधा उल्लंघन है जिनमें स्पष्ट उल्लेख है कि किसी भी पंचायत में शामिल किए जाने वाले गांवों की भौगोलिक सीमाएं आपस में जुड़ी होनी अनिवार्य हैं। ​ग्रामीणों का तर्क है कि गुलासर गांव की सीमा ईसरनावड़ा पंचायत से कहीं भी स्पर्श नहीं करती। वर्तमान स्थिति इतनी जटिल है कि गुलासर के निवासियों को अपने नए पंचायत मुख्यालय ईसरनावड़ा तक पहुंचने के लिए ‘बिरलोका’ और ‘पापासनी’ जैसी अन्य पंचायतों के बीच से गुजरना पड़ता है। इतना ही नहीं, ग्रामीणों को अपने प्रशासनिक कार्यों के लिए जोधपुर जिले की सीमा को पार करते हुए लंबा सफर तय करना होगा। यह स्थिति न केवल आमजन के लिए असुविधाजनक है, बल्कि प्रशासनिक सुगमता के सिद्धांत के भी पूरी तरह विपरीत है। ​ज्ञापन में ग्रामीणों ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि पंचायत पुनर्गठन का असली उद्देश्य प्रशासन को जनता के नजदीक लाना होता है, लेकिन इस निर्णय से ग्रामीणों पर अनावश्यक आर्थिक और मानसिक बोझ पड़ेगा। यह गुलासर के नागरिकों के संवैधानिक और प्रशासनिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला कदम है। ​ग्रामीणों ने प्रशासन से पुरजोर मांग की है कि इस नियम विरुद्ध समावेशन आदेश को तत्काल निरस्त या संशोधित किया जाए। उन्होंने मांग की है कि गुलासर गांव को उसकी भौगोलिक सीमा से लगी हुई उपयुक्त ग्राम पंचायत में ही यथावत रखा जाए। ग्रामीणों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि इस निर्णय पर पुनर्विचार नहीं किया गया, तो वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए उच्च प्रशासनिक और न्यायिक शरण में जाने को विवश होंगे।

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