सरकारी अस्पतालों में इलाज के नाम पर मरीजों को सुरक्षित और असरदार दवाएं मिलने का भरोसा अब सवालों के घेरे में है। तमाम दावों और निगरानी तंत्र के बावजूद मध्यप्रदेश के सरकारी अस्पतालों में लगातार अमानक दवाएं सामने आ रही हैं। जनवरी से अब तक करीब दो दर्जन दवाएं गुणवत्ता मानकों पर खरी नहीं उतर पाईं। चिंता की बात यह है कि जांच रिपोर्ट आने तक हजारों मरीज इन दवाओं का सेवन कर चुके होते हैं। यानी नुकसान सामने आने के बाद ही सिस्टम हरकत में आता है। छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड के बाद सरकार ने दवा निगरानी को लेकर सख्ती के बड़े-बड़े वादे किए थे, लेकिन हालात अब भी जस के तस नजर आ रहे हैं। अब इस चुनौती से निपटने के लिए मप्र हेल्थ कॉर्पोरेशन ने नई रणनीति तैयार की है। इसके तहत प्रदेश में सेंट्रल मेडिकल वेयरहाउस बनाया जाएगा, जहां से सरकारी अस्पतालों को दवाओं की आपूर्ति होगी और गुणवत्ता पर तीन स्तर की सख्त जांच लागू की जाएगी। जांच रिपोर्ट आने तक दवा खा चुका होता है मरीज
अमानक दवाओं के मामलों में सबसे गंभीर पहलू यह है कि जांच की प्रक्रिया समय लेने वाली होती है। जब तक लैब से रिपोर्ट आती है, तब तक संबंधित दवा अस्पतालों में बांटी जा चुकी होती है। यानी मरीज अनजाने में ऐसी दवाएं खा लेते हैं, जिनका असर कम या नुकसानदेह हो सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मरीजों की सेहत से सीधा खिलवाड़ है। कई मामलों में दवा बंद करने का आदेश तब आता है, जब सैकड़ों या हजारों खुराकें इस्तेमाल हो चुकी होती हैं। छिंदवाड़ा कांड के बाद भी नहीं सुधरी व्यवस्था
छिंदवाड़ा में कफ सिरप से जुड़ा मामला सामने आने के बाद सरकार ने दवा निगरानी को लेकर सख्ती के दावे किए थे। कहा गया था कि अब सरकारी अस्पतालों में केवल जांची-परखी दवाएं ही पहुंचेंगी। इसके बावजूद हालिया आंकड़े बताते हैं कि जमीनी हकीकत अलग है। फिलहाल अस्पतालों में दवा पहुंचने के बाद रेंडम सैंपलिंग की जाती है। इसी दौरान कई बार दवाएं अमानक पाई जाती हैं। समस्या यह है कि तब तक दवा मरीजों तक पहुंच चुकी होती है। नई व्यवस्था में यह जोखिम कम करने का दावा किया जा रहा है, क्योंकि दवा मरीज तक पहुंचने से पहले ही पूरी जांच हो जाएगी। बनेगा सेंट्रल मेडिकल वेयरहाउस
अमानक दवाओं पर लगाम लगाने के लिए मप्र हेल्थ कॉर्पोरेशन अब नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी में है। इसके तहत एक सेंट्रल मेडिकल वेयरहाउस बनाया जाएगा। यहां प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली दवाओं का कम से कम छह महीने का स्टॉक रखा जाएगा। वेयरहाउस बनने के बाद दवाएं पहले से स्टॉक में रहेंगी और जरूरत पड़ते ही अस्पतालों तक भेजी जा सकेंगी। इससे सप्लाई चेन ज्यादा तेज और भरोसेमंद होगी। कॉर्पोरेशन का दावा है कि इस वेयरहाउस के जरिए न सिर्फ दवाओं की गुणवत्ता पर बेहतर नियंत्रण रहेगा, बल्कि अस्पतालों में दवाओं की कमी की समस्या भी काफी हद तक खत्म हो जाएगी। तीन स्तर पर होगी सख्त जांच – पहले चरण में निर्माता कंपनी की गुणवत्ता रिपोर्ट ली जाएगी। – दूसरे चरण में दवा को एनएबीएल मान्यता प्राप्त लैब से सर्टिफिकेट लेना होगा। – तीसरे चरण में हेल्थ कॉर्पोरेशन खुद रेंडम सैंपलिंग कर दवाओं की जांच करेगा। वेयरहाउस से क्या होंगे फायदे हाल के महीनों में अमानक पाई गई प्रमुख दवाएं अमानक दवाएं बढ़ा सकती हैं खतरा
एनएचएम के पूर्व संचालक डॉ. पंकज शुक्ला का कहना है कि अमानक दवा का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि मरीज को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता। बीमारी ठीक होने की बजाय बढ़ सकती है। वहीं, अगर दवा की गुणवत्ता बेहद खराब हो, तो इससे एलर्जी, किडनी डैमेज और अन्य अंगों पर प्रतिकूल असर भी पड़ सकता है। दवाओं की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। सरकारी अस्पतालों में आने वाला मरीज पहले ही आर्थिक और शारीरिक रूप से कमजोर होता है, ऐसे में अमानक दवाएं उसके लिए जानलेवा साबित हो सकती हैं।


