अंधविश्वास और लापरवाही कई बार मासूम जिंदगियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन जाती है। बैरसिया के ग्राम आकिया में जन्मी एक 15 दिन की बच्ची इसका जीता-जागता उदाहरण है। जन्म के बाद लगातार घटते वजन और बिगड़ते स्वास्थ्य के बावजूद परिजन झाड़-फूंक के सहारे इलाज कराने पर अड़े रहे। हालात इतने गंभीर हो चुके थे कि बच्ची का वजन 2.5 किलो से घटकर महज 1.7 किलो रह गया। ऐसे समय में गांव की आशा कार्यकर्ता ने हालात की गंभीरता को समझा और हार नहीं मानी। लगातार समझाइश, निगरानी और अधिकारियों को सूचना देकर आखिरकार बच्ची को अस्पताल पहुंचाया गया। बुधवार को कमला नेहरू अस्पताल में इलाज के बाद नवजात के वजन और स्वास्थ्य में लगातार सुधार हो रहा है। यह मामला न सिर्फ आशा कार्यकर्ताओं की सजगता को दिखाता है, बल्कि यह भी बताता है कि समय पर लिया गया एक सही फैसला जीवन और मृत्यु के बीच का फर्क बन सकता है। 17 दिसंबर को हुआ था जन्म
बैरसिया के ग्राम आकिया में 17 दिसंबर को जन्मी बच्ची का वजन जन्म के समय 2.5 किलोग्राम था, जो सामान्य माना जाता है। लेकिन जन्म के कुछ ही दिनों बाद बच्ची का वजन तेजी से घटने लगा। सातवें दिन वजन 2.10 किलोग्राम और दसवें दिन तक घटकर 1.7 किलोग्राम रह गया। यह स्थिति नवजात के लिए बेहद खतरनाक थी और तत्काल चिकित्सकीय हस्तक्षेप की मांग कर रही थी। झाड़-फूंक पर अड़े रहे परिजन
बच्ची की बिगड़ती हालत के बावजूद परिजन आधुनिक चिकित्सा की बजाय झाड़-फूंक पर भरोसा कर रहे थे। उनका मानना था कि किसी बाहरी असर या नजर दोष के कारण बच्ची कमजोर हो रही है। आशा कार्यकर्ता द्वारा अस्पताल ले जाने की सलाह को भी शुरुआत में परिवार ने गंभीरता से नहीं लिया। गांव की आशा कार्यकर्ता सुमन लोवंशी गृह आधारित शिशु स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम के तहत नियमित रूप से मां और नवजात की निगरानी कर रही थीं। गृह भेंट के दौरान उन्होंने वजन में लगातार गिरावट को पहचाना। पहले ही दौरे में उन्होंने मां को स्तनपान से जुड़ा जरूरी परामर्श दिया, लेकिन इसके बावजूद वजन में सुधार नहीं हुआ। आशा कार्यकर्ता की सजगता ने बचाई जान
जब तीन दिन बाद दोबारा जांच में बच्ची का वजन और कम पाया गया, तो आशा कार्यकर्ता ने इसे सामान्य कमजोरी मानने के बजाय गंभीर खतरे के रूप में देखा। उन्होंने तुरंत आशा सुपरवाइजर को सूचना दी और बच्ची को अस्पताल ले जाने पर जोर दिया। परिजन तैयार नहीं हुए, लेकिन आशा कार्यकर्ता ने प्रयास जारी रखा। परिजनों के इनकार के बाद मामला सीएमएचओ कार्यालय तक पहुंचाया गया। निर्देश मिलते ही ब्लॉक स्तरीय स्वास्थ्य टीम सक्रिय हुई। सामूहिक समझाइश और प्रशासनिक सहयोग के बाद आखिरकार 26 दिसंबर को बच्ची को 108 एंबुलेंस से कमला नेहरू अस्पताल भोपाल में भर्ती कराया गया। अंधविश्वास छोड़ समय पर इलाज जरूरी
कमला नेहरू अस्पताल में चिकित्सकों की निगरानी में बच्ची का इलाज शुरू किया गया। यहां नवजात को आवश्यक पोषण, दवाएं और विशेष देखभाल दी गई। कुछ ही दिनों में बच्ची के वजन और स्वास्थ्य में सुधार दिखने लगा, जिससे परिवार ने भी राहत की सांस ली। यह मामला साफ संदेश देता है कि अंधविश्वास के चक्कर में पड़कर समय गंवाना नवजातों के लिए जानलेवा हो सकता है। आशा कार्यकर्ता की समझदारी और सिस्टम की सक्रियता से एक मासूम की जान बच सकी। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि नवजात में वजन का तेजी से गिरना हमेशा गंभीर संकेत होता है और ऐसे मामलों में तुरंत अस्पताल जाना चाहिए। सीएमएचओ बोले- घर-घर जाकर बच्चों की स्थिति देख रही टीम
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) भोपाल डॉ. मनीष शर्मा ने बताया कि शिशु मृत्यु दर कम करने और नवजातों के स्वास्थ्य में सुधार के लिए गृह आधारित शिशु स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसके तहत आशा कार्यकर्ता जन्म के बाद नियमित अंतराल पर घर-घर जाकर बच्चों की स्थिति का आकलन करती हैं और जरूरत पड़ने पर समय पर उपचार सुनिश्चित कराती हैं।


