आज के बच्चे पढ़ाई और टेक्नोलॉजी के मामले में भले ही तेज हों, लेकिन उनके व्यवहार में बढ़ती आक्रामकता और हाइपर एक्टिविटी पेरेंट्स की चिंता लगातार बढ़ा रही है। पेरेंट्स बताते हैं कि बच्चों का ध्यान जल्दी भटक जाता है, वे शांत नहीं बैठ पाते और भावनाओं पर नियंत्रण खोने लगते हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार यह समस्या किसी एक उम्र तक सीमित नहीं रही। प्राइमरी से लेकर मिडिल क्लास तक के बच्चों में ऐसे लक्षण दिख रहे हैं। केस स्टडीज में सामने आया है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम, पूरी नींद न मिलना और अनुशासनहीन दिनचर्या बच्चों के मानसिक संतुलन को बिगाड़ रही है। मोबाइल, ऑनलाइन गेम्स और सोशल मीडिया बच्चों के दिमाग को लगातार उत्तेजित अवस्था में रख रहे हैं, जिससे वे सामान्य स्थितियों में भी असहज और आक्रामक प्रतिक्रिया देने लगते हैं। डिजिटल टाइम कंट्रोल व स्लीप रूटीन जरूरी लगातार स्क्रीन पर रहने से बच्चों का दिमाग आराम नहीं कर पाता। नींद की कमी बच्चों को चिड़चिड़ा, बेचैन और जल्दी गुस्सा करने वाला बना देती है। इसके साथ ही अगर घर में बातचीत का माहौल कम हो और सिर्फ पढ़ाई या परफॉर्मेंस पर जोर हो, तो बच्चा भावनात्मक रूप से असंतुलित होने लगता है। बच्चों को सिर्फ अंक और रिजल्ट तक सीमित करना सही नहीं है। उन्हें यह सिखाना भी जरूरी है कि अपनी बात कैसे कहें, गुस्से को कैसे संभालें और दूसरों की बात कैसे सुनें। पेरेंट्स को बच्चों के लिए संतुलित रूटीन बनाना चाहिए, जिसमें तय स्क्रीन टाइम, पूरी नींद, खेलकूद और परिवार के साथ समय शामिल हो। अगर बच्चा लगातार बेचैन रहता है, गुस्से पर कंट्रोल नहीं कर पा रहा या उसका व्यवहार अचानक बदल गया है, तो इसे नजरअंदाज न करें। रितु कपूर, चाइल्ड काउंसलर सिटी एंकर केस 1 : मोबाइल बंद कराया तो गुस्सा भड़का: 10 साल का एक बच्चा पढ़ाई के समय मोबाइल बंद करने को कहने पर अचानक भड़क गया। उसने किताबें और बैग जमीन पर फेंक दिए। मां का कहना है कि बच्चा पढ़ाई में अच्छा है, लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसका गुस्सा और बेचैनी बहुत बढ़ गई है। डॉक्टर की सलाह पर जांच हुई तो पता चला कि देर रात तक मोबाइल देखने और नींद पूरी न होने की वजह से उसका व्यवहार असंतुलित हो गया था। केस 2 : हर बात पर बोलना और शांत न बैठ पाना बना आदत : 9 साल का बच्चा घर में लगातार बोलता रहता है, एक जगह टिक कर बैठ नहीं पाता और हर बात पर बीच में टोकता है। पिता बताते हैं कि बच्चा किसी की पूरी बात सुनता ही नहीं और तुरंत प्रतिक्रिया देता है। पहले इसे सामान्य चंचलता समझा गया, लेकिन जब स्कूल से भी शिकायत आने लगी तो पेरेंट्स काउंसलिंग के लिए पहुंचे। काउंसलर ने इसे हाइपर एक्टिव बिहेवियर बताया, जिसकी बड़ी वजह अनियमित रूटीन और जरूरत से ज्यादा स्क्रीन एक्सपोजर थी। केस 3 : स्कूल में कंट्रोल खो बैठी बच्ची : 12 साल की छात्रा क्लास में बार-बार सीट से उठती थी और टीचर के टोकने पर ऊंची आवाज में जवाब देने लगी। एक दिन स्थिति इतनी बिगड़ गई कि स्कूल ने पेरेंट्स को बुलाना पड़ा। काउंसलिंग के दौरान सामने आया कि बच्ची देर रात तक मोबाइल पर वीडियो देखती थी और उसकी नींद पूरी नहीं हो पा रही थी। इसका असर उसके धैर्य और व्यवहार पर साफ दिखाई दे रहा था।


