धनबाद में रिंग रोड बनाने की मांग वाली याचिका हाईकोर्ट ने शुक्रवार को खारिज कर दी। चीफ जस्टिस एमएस रामचंद्र राव व जस्टिस गौतम कुमार चौधरी ने कहा कि यह नीतिगत मामला है। सुनवाई पूरी होने के बाद खंडपीठ ने 7 जनवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। यह याचिका अजय नारायण लाल ने दायर की थी। कहा था कि सरकार ने 16 मई 2011 को धनबाद में रिंग रोड बनाने की अधिसूचना जारी की थी। जमीन अधिग्रहण पर भी 76 करोड़ खर्च हो गए। मुआवजा भुगतान में गड़बड़ी सामने आने पर इसका काम शुरू नहीं किया गया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सख्त टिप्पणी भी की। विधायिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र की व्याख्या करते हुए कोर्ट ने जजों को भी संयम बरतने और कार्यकारी या विधायी क्षेत्र में अतिक्रमण करने से बचने की सलाह दी। सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग करते हुए कार्यकारी कार्य करने का प्रयास करने वाले जजों की प्रथा की भी निंदा की है। कोर्ट से न्यायिक संयम बरतने और कार्यकारी व विधायी क्षेत्र में अतिक्रमण करने से बचने को कहा है। खंडपीठ ने कहा कि डिविजनल मैनेजर, अरावली गोल्फ क्लब बनाम चंदर हस और अन्य मामले में यह देखा गया कि संविधान के तहत विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सभी के पास संचालन के अपने व्यापक क्षेत्र हैं। आमतौर पर राज्य के इन अंगों में से किसी के लिए दूसरे के क्षेत्राधिकार का अतिक्रमण करना उचित नहीं है। अतिक्रमण होने से संतुलन बिगड़ेगा और प्रतिक्रिया होगी। खंडपीठ ने कहा है कि जजों को अपनी सीमाएं जाननी चाहिए और सरकार चलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। शक्तियों के अलग-अलग सिद्धांत का पालन किया जाना चाहिए। कोर्ट को प्रशासनिक अधिकारियों को शर्मिंदा भी नहीं करना चाहिए और यह समझना चाहिए कि प्रशासनिक अधिकारियों के पास प्रशासन के क्षेत्र की विशेषज्ञता है, जबकि कोर्ट के पास नहीं है। कोर्ट ने कहा… अधिग्रहण के बाद जमीन सरकार की संपत्ति कोर्ट ने आदेश में कहा कि धनबाद में रिंग रोड बनाने या न बनाने का फैसला लेना एक प्रशासनिक मामला है। संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत यह हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र का मामला नहीं है। खासकर जब रिंग रोड के लिए जमीन अधिग्रहण के प्रस्ताव के निपटारे में गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप हों और प्रतिवादियों के अनुसार इस संबंध में आपराधिक मामले भी दर्ज किए गए हैं। कोर्ट ने कहा कि अगर जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पहले ही पूरी हो गई है तो निस्संदेह जमीन राज्य सरकार के पास आ चुकी है। यह स्पष्ट है कि अधिग्रहण के बाद जमीन सरकार की हो जाती है। अब यह सरकार पर निर्भर है कि उस जमीन का उपयोग उस उद्देश्य के लिए न किया जाए, जिसके लिए अधिग्रहण हुआ था। जब तक अधिग्रहण रद्द नहीं हो जाता।


