श्री श्री परमहंस योगानंदजी के आविर्भाव दिवस के पावन अवसर पर उनके जीवन और शिक्षाएं आज भी असंख्य साधकों को आध्यात्मिक पथ पर प्रेरणा प्रदान कर रही हैं। उनका यह कथन यदि मैं आपसे नहीं मिलता हूं, तो समझिए कि मैं कहीं और आपके लिए कार्य कर रहा हूं। गुरु और शिष्य के शाश्वत, आध्यात्मिक संबंध की गहन व्याख्या करता है, जो देह और काल की सीमाओं से परे है। श्रीश्री परमहंस योगानंद का जन्म 5 जनवरी 1893 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ। उनके माता-पिता भगवती चरण घोष व ज्ञान प्रभा घोष धार्मिक व आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। बाल्यकाल से ही योगानंदजी को ध्यान, प्रार्थना व दिव्य अनुभूतियों में विशेष रुचि थी। इन अनुभवों का उल्लेख उन्होंने अपनी विश्वविख्यात आत्मकथा ‘योगी कथामृत’ में किया है। सन 1910 में मात्र 17 वर्ष की आयु में उन्हें अपने सद्गुरु स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी का सान्निध्य प्राप्त हुआ। लेखिका : रेणु सिंह परमार


