एक ओर सरकार जहां सर्व शिक्षा अभियान के तहत शिक्षा का स्तर बढ़ाने और विद्यालयों को सुविधा युक्त बनाने के लिए करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। वहीं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सपनों और आदर्शों का डुमरी राजकीय बुनियादी विद्यालय सरकारी उदासीनता के कारण अपना महत्व खोता जा रहा है। आजादी के बाद महात्मा गांधी का सपना था कि सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को सामान्य शिक्षा के साथ-साथ व्यवसायिक रूप से प्रशिक्षित किया जाए, ताकि प्रशिक्षण प्राप्त कर बच्चे आत्मनिर्भर बन सके। इसी उद्देश्य के तहत राजकीय बुनियादी विद्यालय की स्थापना की गई थी। लेकिन सरकार की उदासीन रवैये के कारण विद्यालय का मूल पहचान खोता चला गया। आज इस विद्यालय में ऐसा कुछ शेष नहीं है, जिससे राष्ट्रपिता के सपनों के धरोहर को सहेज कर रखा जा सके। धीरे-धीरे इस विद्यालय में नामांकित बच्चों को पढ़ाने और प्रशिक्षित करने वाले शिक्षकों की बहाली बंद कर दी गई। आज किसी तरह इस विद्यालय में पठन- पाठन का कार्य संचालित किया जा रहा है। बताया जाता है कि इस विद्यालय में एक प्रधानाध्यापक सहित 10 शिक्षकों का स्थायी पद है। परंतु वर्षों से राजकीय बुनियादी विद्यालय कैडर में बहाली नहीं होने से इस विद्यालय में एक भी स्थायी शिक्षक नहीं है। हैरान करने वाली बात तो यह है कि 1991 के बाद से सरकार द्वारा राजकीय बुनियादी विद्यालय कैडर से शिक्षकों की बहाली नहीं की गई है। कैडर में बहाली नहीं होने से आज इस स्कूल में पठन पाठन का जिम्मा युक्तिकरण पर आये पारा शिक्षकों पर है। 2008 में इस विद्यालय के लिए दो पारा शिक्षकों की नियुक्ति की गयी थी। एक पारा शिक्षक का निधन होने और एक पारा शिक्षक की बहाली सरकारी शिक्षक में हो जाने के कारण विद्यालय के नाम पर पारा शिक्षकों का दोनों पद खाली हो चुका है। इस विद्यालय में लगभग 358 बच्चें नामांकित हैं। स्थायी शिक्षक नहीं होने के कारण बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा युक्तिकरण पर प्रखंड के विभिन्न सरकारी विद्यालयों से पदस्थापित किए गए सहायक अध्यापकों के भरोसे है। आज इस विद्यालय में 7 सहायक अध्यापक और 1 प्रतिनियुक्ति पर आए सरकारी शिक्षक बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं। व्यवसायिक शिक्षा देना तो दूर की बात है। चूंकि इन सहायक अध्यापकों की नियुक्ति प्रखंड की विभिन्न पंचायतों के स्कूलों से की गई है। ऐसी स्थिति में उनके मूल विद्यालय में शिक्षकों की कमी होना स्वाभाविक है। बुनियादी विद्यालय की स्थापना के बाद यहां हस्तकरघा, टोकरी निर्माण, लकड़ी का सामान बनाने, चटाई बनाने, सिलाई और कटाई का प्रशिक्षण अनिवार्य रूप से दिया जाता था। आज शिक्षकों के अभाव में व्यवसायिक शिक्षा देने का काम पूरी तरह से ठप हो गया है। अब सिर्फ इस विद्यालय में व्यवसायिक शिक्षा की यादें ही बचा हुई है। विद्यालय के एक कमरे में अभी भी हस्त करघा और सूत रखा हुआ है। जिसे कभी इस्तेमाल में लाया जाता था।


