लापरवाही या निजी सेंटर को फायदा पहुंचाने की प्लानिंग:​​​​​​​24 करोड़ का सीटी स्कैन-एमआरआई सेटअप फिर भी नहीं हो रहीं जांच,अधिकारियों ने टेंडर में किया बदलाव

भोपाल के हमीदिया अस्पताल सहित मध्यप्रदेश के पांच सरकारी मेडिकल कॉलेजों में सामने आई गंभीर लापरवाही ने सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की तैयारियों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। करोड़ों की अत्याधुनिक सीटी स्कैन और एमआरआई मशीनें मरीजों के लिए पूरी तरह उपयोगी साबित नहीं हो पा रही हैं। वजह बेहद चौंकाने वाली है। इन मशीनों को बिना प्रेशर इंजेक्टर के चलाया जा रहा है, जबकि इसकी कीमत महज 30 लाख रुपए है। प्रेशर इंजेक्टर के बिना सीटी स्कैन और एमआरआई से कॉन्ट्रास्ट स्टडी संभव नहीं हो पाती। इसके चलते कैंसर, ट्यूमर, हृदय रोग और न्यूरोलॉजी से जुड़ी जटिल बीमारियों की सटीक जांच प्रभावित हो रही है। कई मामलों में मरीजों को या तो अधूरी रिपोर्ट दी जा रही है या फिर स्पष्ट निष्कर्ष नहीं निकल पा रहा। इस कारण गंभीर मरीजों को मजबूरी में महंगे निजी जांच केंद्रों पर जाना पड़ रहा है। जिससे मरीजों पर आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। 24 करोड़ का सेटअप, लेकिन अधूरा राज्य सरकार ने जुलाई 2025 में प्रदेश के पांच मेडिकल कॉलेजों में सीटी स्कैन और एमआरआई जांच सुविधा शुरु की है। इस सेटअप की लागत करीब 24 करोड़ रुपए है। इसमें से अकेली एमआरआई मशीन 18 करोड़ की है। सरकार ने इसे स्वास्थ्य सेवाओं में बड़ा सुधार बताते हुए प्रचारित भी किया, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट है। एमआरआई मशीनों के साथ जरूरी प्रेशर इंजेक्टर नहीं खरीदे गए। हैरानी की बात यह है कि जिस इंजेक्टर के बिना एमआरआई की कई अहम जांचें संभव ही नहीं हैं। सरकार ने सौ करोड़ से ज्यादा का हाईटेक सेटअप तो खड़ा कर दिया, लेकिन 30 लाख का एक उपकरण नहीं खरीद पा रही है। फाइनल टेंडर से बाहर कर दिया इंजेक्टर विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ तकनीकी चूक नहीं, बल्कि गंभीर प्रशासनिक लापरवाही है। वहीं, हमीदिया अस्पताल के रेडियोलॉजी विभाग के वरिष्ठ डॉक्टर ने कहा कि पहले यह इंजेक्टर टेंडर का हिस्सा था। लेकिन मध्यप्रदेश के हेल्थ कॉर्पोरेशन ने इसे फाइनल टेंडर से बाहर कर दिया। जिससे अब यह एक नई समस्या खड़ी हो गई है। जब इसको लेकर सवाल किए गए तो केवल प्रेशर इंजेक्टर के लिए नए टेंडर करने का दावा किया गया है। हाईटेक मशीन, हाईटेक जांच नहीं
सरकारी मेडिकल कॉलेजों में लगाई गई एमआरआई मशीनें एडवांस और विश्वस्तरीय तकनीक से लैस हैं। इन मशीनों में कैंसर, हृदय रोग, न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर और जटिल संक्रमणों की बारीक जांच करने की क्षमता है, लेकिन प्रेशर इंजेक्टर के बिना ये क्षमताएं सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई हैं। एमआरआई में कई जांचें ऐसी होती हैं, जिनमें कंट्रास्ट डाई का इस्तेमाल जरूरी होता है। यह डाई नसों के जरिए शरीर में एक निश्चित गति और दबाव के साथ पहुंचाई जाती हैं। इसी प्रक्रिया को प्रेशर इंजेक्टर नियंत्रित करता है। इंजेक्टर न होने की वजह से कैंसर, ट्यूमर, हार्ट डिजीज और ब्रेन से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों में सटीक रिपोर्ट नहीं मिल पा रही है। डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे मामलों में या तो जांच अधूरी रह जाती है या फिर रिपोर्ट स्पष्ट नहीं होती। नतीजतन मरीज को दोबारा जांच करानी पड़ती है, वह भी निजी डायग्नोस्टिक सेंटर में। इससे न सिर्फ इलाज में देरी होती है, बल्कि आर्थिक बोझ भी मरीज पर ही पड़ता है। किन बीमारियों में इंजेक्टर सबसे ज्यादा जरूरी
ब्रेन ट्यूमर की पहचान- प्रेशर इंजेक्टर का मुख्य काम गैडोलिनियम आधारित कंट्रास्ट डाई को शरीर में सटीक समय और दबाव के साथ पहुंचाना है। यह कई गंभीर बीमारियों की पहचान में अहम भूमिका निभाता है। ट्यूमर और कैंसर के मामलों में इंजेक्टर की मदद से यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि ट्यूमर सामान्य ऊतकों से कितना अलग है और उसकी आक्रामकता कितनी है। न्यूरोलॉजी में ब्रेन ट्यूमर, मल्टीपल स्केलेरोसिस और सूजन संबंधी बीमारियों की पहचान कंट्रास्ट एमआरआई से ही सही ढंग से हो पाती है। ह्रदय रोग की पहचान- कार्डियोलॉजी में हृदय की मांसपेशियों में डैमेज, ब्लड फ्लो की कमी और हार्ट अटैक के बाद हुए बदलावों का आकलन इंजेक्टर के बिना संभव नहीं है। एमआरआई एंजियोग्राफी में नसों और धमनियों की ब्लॉकेज या एन्यूरिज्म का पता लगाने के लिए भी यह बेहद जरूरी उपकरण है। हड्‌डियों के संक्रमण की पहचान- इसके अलावा शरीर के अंगों और हड्डियों में छिपे संक्रमण को पहचानने में भी कंट्रास्ट एमआरआई अहम भूमिका निभाता है। इंजेक्टर के बिना इन सभी जांचों की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। मैनुअल डाई से चल रहा काम, बढ़ रहा जोखिम इंजेक्टर की कमी के चलते हमीदिया अस्पताल सहित प्रदेश के सभी संबंधित मेडिकल कॉलेजों में फिलहाल डाई मैनुअल तरीके से दी जा रही है। यानी डॉक्टर या टेक्नीशियन हाथ से सीरिंज के जरिए नस में डाई डालते हैं। यह तरीका न सिर्फ जोखिम भरा है, बल्कि जांच की गुणवत्ता पर भी सीधा असर डालता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि कई एमआरआई स्कैन में सेकंड के हिसाब से टाइमिंग जरूरी होती है। जैसे ही डाई नस में पहुंचती है, उसी क्षण मशीन को स्कैन शुरू करना होता है। हाथ से डाई देते समय यह तालमेल बैठाना बेहद मुश्किल होता है। इसके अलावा इंजेक्टर एक समान दबाव से डाई देता है, जिससे नसें साफ और स्पष्ट दिखाई देती हैं। मैनुअल इंजेक्शन में दबाव कम या ज्यादा हो सकता है, जिससे इमेज धुंधली आने की आशंका बढ़ जाती है। इंजेक्टर डाई के बाद तुरंत सलाइन फ्लश भी करता है, ताकि पूरी डाई शरीर में चली जाए। हाथ से यह प्रक्रिया पूरी तरह संभव नहीं होती और महंगी डाई का एक हिस्सा ट्यूब में ही बर्बाद हो जाता है। प्रबंधन ने कहा- मरीजों को कोई परेशानी नहीं
मामले में गांधी मेडिकल कॉलेज की डीन डॉ. कविता एन सिंह ने कहा कि इसकी जानकारी मंगाई है। हालांकि, मरीजों की जांच समय पर हो रही है। उन्हें किसी भी तरह की परेशानी नहीं हो रही है। वहीं, मध्यप्रदेश हेल्थ कॉर्पोरेशन की तरफ से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान अब तक नहीं आया है।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *