गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में छत्तीसगढ़ का पारंपरिक लोक पर्व छेरछेरा पूरे उमंग और उत्साह के साथ मनाया गया। सुबह से ही बच्चों की टोलियां हाथों में थैले लेकर गांव की गलियों में निकल पड़ी। वे पारंपरिक नारों के साथ घर-घर जाकर अनाज की मांग किए। बच्चे “छेरछेरा छेरछेरा, माई कोठी के धान ल हेरहेरा, अरन बरन कोदो दरन, जभे देबे तभे टरन” जैसे लोक नारों के साथ उत्साहित होकर घरों का चक्कर लगाए। ग्रामीण भी इस पर्व में बड़े उत्साह से धान, कोदो, कुटकी सहित विभिन्न अनाज दान कर रहे हैं, जिससे पर्व की परंपरा जीवंत बनी हुई है। वेशभूषा धारण कर इन नृत्यों का प्रस्तुत कई इलाकों में इस अवसर पर मांदर की थाप पर शैला और डंडा नृत्य का शानदार आयोजन किया गया। युवाओं और बुजुर्गों ने पारंपरिक वेशभूषा धारण कर इन नृत्यों को प्रस्तुत किया। बच्चों के चेहरों पर छेरछेरा पर्व का उत्साह साफ झलक रहा था। यह पर्व न केवल बच्चों के लिए आनंद का विषय है, बल्कि ग्रामीण संस्कृति को संरक्षित करने का भी एक महत्वपूर्ण माध्यम है। छेरछेरा के माध्यम से सामाजिक एकता और परंपरागत मूल्यों का संदेश भी प्रसारित हो रहा है।


