गेहूं, मक्का और उड़द जैसी पारंपरिक फसलों में दिन रात मेहनत करने के बाद भी इतनी ही आमदनी हो पाती थी कि बमुश्किल घर चल पाता। कभी बारिश की मार तो कभी भाव की कमी से लागत भी नहीं निकलती थी। ऐसे में भीलवाड़ा जिले के भगवानपुरा गांव निवासी युवा किसान राहुल सोलंकी ने औषधीय फसलों का रास्ता चुना। दो साल से वे सुपरफूड चिया सीड व अश्वगंधा की फसल ले रहे हैं। इससे खेती की लागत कम हो गई है। इनमें खराबे का डर भी नहीं रहा। जानवर इन फसलों को नहीं खाते। 12वीं पास राहुल ने इसके लिए कहीं से ट्रेनिंग नहीं ली। अखबार -मैग्जीन में पढ़कर उन्होंने औषधीय फसलों की खेती करने का मन बनाया। अलग फसलें और कीटनाशक केमिकल से मुक्त खेती शुरू कर कई खर्चों को भी कम करके लागत को आधा कर दिया। उन्होंने बताया कि चिया सीड व अश्वगंधा को कम पानी की जरूरत होती है। जंगली जानवरों का कोई डर नहीं। मार्केट में हमेशा अच्छे भाव मिलते हैं। एक बीघा में सिर्फ एक किलो बीज की जरूरत होती है। जबकि उत्पादन चार से पांच क्विंटल तक हो जाता है। पानी सिर्फ 3 बार पिलाना पड़ता है। इसकी फसल वर्ष में दो बार जुलाई और अक्टूबर में ले सकते हैं। बाजार में इसके भाव 17 से 24 हजार रुपए तक मिल रहे हैं। राहुल ने खेती में रासायनिक खर्चों को कम करने के लिए जैविक खाद बनानी शुरू की। इससे मिट्टी को उपजाऊ बनाया । हालांकि इन फसलों के लिए ज्यादा उपजाऊ जमीन की भी जरूरत नहीं रहती। मगर पानी का भराव नहीं होना चाहिए। शुरुआत में 50 हजार रुपए की लागत लगाकर 4 महीनों में 1 एकड़ जमीन से दो से तीन लाख रुपए की कमाई हुई है। अब उन्होंने इसे दूसरी बार बोया है। इसकी खेती मध्यप्रदेश के नीमच और मालवा इलाके में हो रही है। नीमच मंडी में ही फसल बिक रही है। भगवानपुरा के आसपास किसानों को इसकी जानकारी नहीं है और न ही औषधीय फसलों की मंडी है। वे बताते हैं कि “मेरा उद्देश्य केवल पैसा कमाना नहीं, बल्कि अन्य किसान भाइयों को यह दिखाना है कि नई तकनीक और सही फसल के चुनाव से खेती को फिर से लाभ का सौदा बनाया जा सकता है। आज हम अपनी फसल को दवा बनाने वाली कंपनियों को बेच रहे हैं।


